देहरादून। उत्तराखंड में चीड़ की पत्तियां (पिरूल) का उपयोग कर महिला स्वयं सहायता समूह आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। पिरूल से टोकरियाँ, मैट और सजावटी सामान बनाकर महिलाएं अपनी आर्थिकी को मजबूत कर रही हैं। यह पहल न केवल महिलाओं को रोजगार दे रही है, बल्कि जंगल में आग लगने की समस्या को कम करने में भी मदद कर रही है। राज्य के विभिन्न जिलों में महिलाओं को पिरूल के प्रसंस्करण का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जहाँ वे मेज मैट, पेन स्टैंड और टोकरियाँ जैसे हस्तशिल्प उत्पाद बना रही हैं। पिरूल के उत्पाद बनाकर महिलाएं घर बैठे ही आय अर्जित कर रही हैं, जिससे वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं।
सरकार पिरूल एकत्रीकरण अभियान के तहत स्वयं सहायता समूहों से पिरूल खरीद रही है, जिससे ग्रामीणों को सीधे रोजगार मिल रहा है। पिरूल (चीड़ की पत्तियां) जंगल की आग का मुख्य कारण हैं, इसलिए उनका संग्रहण आग की घटनाओं को कम करने में एक प्रभावी उपाय साबित हो रहा है। पिरूल से आकर्षक उत्पाद तैयार करने का महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। महिलाओं को बताया जा रहा है कि प्रकार पीरूल को नमी से कैसे सुरक्षित रखा जाए, उन्नत तकनीकों से संग्रहण किया जाए, आधुनिक औजारों का प्रभावी उपयोग हो, तथा उसे चूर्ण या छोटे टुकड़ों में परिवर्तित कर उपयोगी उत्पादों में बदला जाए। साथ ही मशीनों के संचालन और उनके रख-रखाव से जुड़ी तकनीकी जानकारी भी दी जा रही है।
ग्रामोत्थान परियोजना (रीप) की दूरदर्शी योजना के चलते पिरूल (चीड़ की सूखी पत्ती) वनाग्नि के बजाय समूहों की आर्थिकी का बेहतर जरिया बनकर उभरा है। रीप की पहल पर शुरू किए गए पिरूल कलेक्शन एवं बायोमास पैलेट प्रोजेक्ट योजना से नई पहल फेडरेशन से जुड़ी सैकड़ों महिला स्वयं सहायता समूहों की आर्थिकी भी बेहतर हुई है। इस प्रोजेक्ट से फेडरेशन हजारों क्विंटल पिरूल बेच चुका है। पिरूल से बने कोयले में कार्बन डाइऑक्साइड गैस नहीं होती जो शरीर को नुकसान नहीं पहुंचता।
उत्तराखंड में हर साल गर्मियों में जंगलों में लगने वाली आग एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आती है, इससे न केवल लाखों हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होता है, बल्कि वन्यजीवों, पर्यावरण और ग्रामीण आजीविका पर भी इसका गंभीर असर पड़ता है। इसी समस्या के स्थायी समाधान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से पीरूल एकत्रीकरण अभियान को व्यापक स्तर पर लागू किया गया है। इस योजना के तहत सरकार स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण महिलाओं से 10 रु प्रति किलो की दर से पीरूल खरीद रही है। उत्तराखंड के कुल वन क्षेत्र का लगभग 15.25 प्रतिशत हिस्सा चीड़ के जंगलों से आच्छादित है। इन जंगलों में हर साल बड़ी मात्रा में पिरूल जमा हो जाता है, जो अत्यधिक ज्वलनशील होता है। यही पिरूल जंगल की आग को तेजी से फैलाने में अहम भूमिका निभाता है। यदि समय रहते इसका एकत्रीकरण कर लिया जाए, तो आग की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
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