उत्तराखंड के पौराणिक वाद्य यंत्र विलुप्ति की कगार पर

-राज्य में संकट के दौर से गुजर रहे पारंपरिक वाद्य यंत्र वादक

देहरादून। उत्तराखंड देश-विदेश में अपनी प्राकृतिक खूबसूरती, रहन सहन, पहनावे, बोली के लिए जाना जाता है। राज्य के हर तीज त्योहार, शादी बारात में बजाये जाने वाले वाद्य यंत्र भूली बिसरी याद बनते जा रहे हंै, क्योंकि इनकी जगह अब इलेक्ट्रॉनिक इंस्ट्रूमेंट लेने लगे हैं। जबकि उत्तराखंड के वाद्य यंत्र कलाकारों की आमदनी ना होने के कारण उनका मोह भंग होने लगा है। पहाड़ों में बजाये जाने वाले ढोल को कौन नहीं जानता, इस बाध्य यंत्र में 52 ताल होते हैं। इसी के साथ बजाए जाने वाले बीन बाजा मशकबीन जिसे बैगपाइपर के नाम भी जाता जाता है को लोग भूलने लगे हैं। इसके अलावा उत्तराखंड की संस्कृति में बसा चिमटा, रणसिंगा, हुड़का, दमो, तूर, खड़ताल, मंजीर, कांस थाली, लोटी, डिंगार को हर तीज त्योहार में बजाया जाता है, लेकिन अब इन वाद्य यंत्रों को बजाने वाले कलाकार इनसे परहेज करने लगे हैं। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह आमदनी ना होना है। ढोल उत्तराखंड का मुख्य वाद्य यंत्र है जो कि शादी समारोह, धार्मिक अनुष्ठानों, पारंपरिक पूजा, पांडव, बगड़वाल परंपरा में बजाया जाता है। दमो हमेशा इसके दायंे तरफ रखकर बजाया जाता है।
उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग, ढोल-दमाऊ वादक (बाजगी) वर्तमान में घोर उपेक्षा और आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं। देवभूमि में मांगलिक कार्यों की रीढ़ माने जाने वाले इन पारंपरिक कलाकारों की स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है। आधुनिकता के प्रभाव के चलते शादियों और पारंपरिक आयोजनों में अब ढोल-दमाऊ की जगह डीजे और लाउड म्यूजिक ने ले ली है। इससे बाजगियों का पारंपरिक रोजगार छिन गया है।
इसके अलावा युवा पीढ़ी इस कठिन विधा को सीखने में रुचि नहीं ले रही है। ढोल सागर (ढोल वादन की विद्या) के जानकारों की संख्या बहुत कम बची है, जिससे इस विधा के लुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है। पारंपरिक काम न मिलने के कारण कई कलाकार दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हैं। कला को सहेजने के लिए कोई सरकारी या निजी प्रोत्साहन न के बराबर मिल रहा है। ढोल-दमाऊ के अलावा, हुड़का और नागफणी जैसे अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्र भी विलुप्ति के कगार पर हैं। जानकारों का मानना है कि यदि जल्द ही ढोल सागर की विधा को संजोया नहीं गया, तो उत्तराखंड की यह पारंपरिक विधा लुप्त हो जाएगी। राज्य के प्रत्येक जनपद, ब्लॉक और ग्राम स्तर पर स्कूलों के माध्यम से इन वाद्य यंत्रों की शिक्षा दी जानी चाहिए। इस कला को स्वरोजगार से जोड़ने और कलाकारों को सरकारी सहायता प्रदान करने की सख्त आवश्यकता है, ताकि वे अपनी पारंपरिक आजीविका को जारी रख सकें। उत्तराखंड के इन लोक कलाकारों को सम्मान और आजीविका देने के लिए ठोस सरकारी नीतियों और सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता है।
पारंपरिक वाद्य यंत्र बनाने वाले लोगों की संख्या में लगातार आ रही कमी। इन वाद्य यंत्रों को बनाने के लिए खास हुनर की जरूरत है और इस विधा को सीखने में नई पीढ़ी की दिलचस्पी नहीं है। वहीं, आज उत्तराखंड के लोकगीतों में भी अब इन पारंपरिक वाद्य यंत्रों का प्रयोग कम होने लगा है। कई वाद्य यंत्र हैं, जो अब देखने को नहीं मिलते जिसमें-रणसिंगा, तुरही और अब मसकबीन भी इसमें शामिल हो रही है। मसकबीन को बजाने के लिए भी खास हुनर की जरूरत पड़ती है, जिसे नई पीढ़ी ने सीखने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है।

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