– हेमचंद्र सकलानी– आज अचानक दो पुस्तकों पर सरसरी नजर डाली तो फिर उनके पृष्ठों से गुजरने से अपने को रोक न सका। पहली थी “डाल हासला,डाल साकी” काव्य संग्रह और दूसरी “लहरों के सागर तट” कहानी संग्रह। इनसे गुजरने की जो सुखद अनुभूति हुई वह मन को आनंदित कर गई। डॉ राकेश बलूनी साहित्य जगत के लिए एक जाना पहचाना परिचित नाम है,ऐसा बताने की जरूरत नहीं है। चिकत्सा सेवा जैसे महत्वपूर्ण कार्य से जुड़ कर अपने उत्तरदायित्वों को निभाते हुए साहित्य सृजन कितना कठिन कार्य होता है यह उनके अलावा शायद ही कोई अन्य बता सके। कवि हो कथाकार हो लेखक हो,चाहे दुनिया के किसी छोर पर भी हो सुख ,दुख,संकट, अभावों,में हो या कितने ही अशांत वातावरण,विपरीत परिस्थितियों में,या अनुकूल परिस्थितियां हों, वहां अपनी एक अलग दुनिया बसा लेता है। भले ही उस दुनिया में वो अलग थलग हो लेकिन उसकी कलम से निकले कलम के शिशु शब्द उसको बहुत संबल प्रदान करते हैं। ऐसा ही बलूनी जी की इन पुस्तकों से गुजरते हुए देखने अनुभव करने को मिला।
वे अपने काव्य संग्रह के कथानक में स्पष्ट रूप से लिखते हैं – आज के काल में मदिरा का सेवन जिस प्रकार सामाजिक व्यवस्था का अंग बन गया है,मैंने भी भाव अपनी लेखनी में डालने का प्रयास किया है, वहीं धरातल प्रश्नों को आज के संदर्भ में इस संग्रह का वितान बना। मदिरा प्रेम में जनमत हार जाएगा लेकिन जो इस प्रेमासक्ति में गहरे तक डूबे हैं उनकी अभिव्यक्ति ही “डाल हाला,डाल साकी” की परिकल्पना है। तभी कहते भी हैं – “मनुज है वह कौन सा वो मस्तियां चाहे नहीं जो,मेरी अभिलाषा मिटा दूं सुख – दुख के भेद ही को। जन्म, जीवन मृत्यु आंकी,डाल हाला,डाल साकी।”
बरबस दशकों पहले कवि अजित कुमार की पंक्तियां याद आ गईं – “सांसों की सीमा निश्चित है पर इच्छाओं का अंत नहीं,जिसको कोई चाह न हो ऐसा कोई संत नहीं।” आगे की पंक्तियां सोचने को पाठक को विवश करती हैं – “घंटा ध्वनि मन्दिर में बजती प्रतिमाओं पर मालाएं चढ़ती,आती मस्जिदों से अजाने,मेरे भीतर तू उतरती। तू ही बुत तू ही खुदा भी,डाल हाला डाल साकी।” साथ ही बच्चन जी की काल जयी मधुशाला की याद दिला देती हैं।”नब्ज भी कुछ बढ़ चली है सांसों में कुछ खलबली है, जुबां भी लड़खड़ाती,चाल भी ढुलमुली है। ये मन हुआ है वीतरागी,डाल हाला,डाल साकी।” हाला का आंतरिक व्यक्तित्व खोने में उक्त पंक्तियां सफल रहीं। अपनी अंतिम पंक्तियों में पुस्तक अपने शिखर को स्पर्श करती नज़र आती है यह कह कर – “मृत्यु भी अब कामना सी जीवन थी साधना सी,मै किसी काबिल रहा कब,जब तेरी मदिरा चढ़ाली। दास बन तुझ से विदा ली,डाल हाला,डाल साकी।”निसंदेह हालावाद पर कुछ कवियों के बाद यह बलूनी जी का एल अलग सफल सुंदर प्रयोग कहा जा सकता है। यद्यपि बलूनी जी ने मधुशाला की लीक से हट कर अपनी अलग पहचान “डाल हाला,डाल साकी” रचकर बनाई है फिर भी संग्रह की हर पंक्ति बच्चन जी की मधुशाला की इन पंक्तियों को – मदिरालय जाने को घर से चलता है पीने वाला………और अलग अलग पथ बतलाते सब …….., को याद दिलाने में सफल रही। यही इसकी सफलता का सूचक है।
उनके कहानी संग्रह “लहरों के सागर तट” से शीघ्रता से गुजरने का अवसर मिला। फकीर चंद कहां है,वैश्या का बेटा,लिफाफा,वारिस,छुट्टी,पछतावा, हैलमेट, पालतू कुत्ता जैसी कुछ कहानियों संग्रह में पढ़ने को मिलीं।इनमे मानवतावादी जीवन दृष्टि,और भावात्मकता की प्रधानता स्पष्ट दिखाई पड़ती है। कहानियों का संवेदनात्मक पक्ष सर्वाधिक प्रबल दृष्टिगोचर होता है। भाषा की सरलता और स्पर्शी गुण कहानियों को विशिष्ठ स्थान पर ले जाता है। ऐसा लगता है जैसे प्रेमचन्द ने कहा था मैं कहानियां बनाता नहीं हूं सजाता नहीं हूं। बल्कि वातावरण से समाज से विषय को उसी तरह उठाता हूं जैसे दिखाई पड़ते हैं। वहीं दृष्टि लेकर बलूनी जी चल रहे हों। यद्यपि आज के समय में भव्य मंचों के साज सज्जा युक्त कवि सम्मेलनों के कारण काव्य की प्रधानता व्याप्त हो रही है लेकिन गनीमत है कथाओं के प्रति पाठकों मै रुझान कम नहीं हुआ। आज और पचास साठ वर्ष पूर्व के साहित्य की विद्याओं में ही क्या मानव की सोच विचार किर्या कलापों में समय के साथ व्यापक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है जो आदिकाल से चला आ रहा है। रामायण महाभारत जैसे ग्रन्थ कोई आज लिखे तो शायद उतने लोगों को न आएं। डॉ राकेश बलूनी की “लहरों के सागर तट” संग्रह की कहानियां वर्तमान समय के संदर्भ में पाठकों को स्पर्श किए बिना नहीं रहती। वह अपनी पंक्तियों में कहते भी हैं – कहानी, समय की धारा के साथ नदियों की धारा की तरह अपनी दिशा और प्रवाह बदलती आ रही है। 🙏🙏🙏🍏दोनों पुस्तकों के रचनाकार अपने साहित्य से ही नहीं अपने शांत सरल व्यक्तित्व से भी सभी को प्रभावित करते हैं डॉ राकेश बलूनी जी को हार्दिक बधाई।
