गौशालाओं की जगह गौ-पालकों को अनुदान देने की बात होनी चाहिए: बी पी बाल्याण

केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा गौ सेवा आयोगों के गठन और लाखों गौशालाएं बनाने के बाद भी आज गौमाता भोजन की तलाश में शहर की गलियों और सड़कों पर मारी-मारी फिर रही है। जब उसे भर पेट खाना नहीं मिलता तो फिर उसे गंदगी भरी पोलीथीन में मुंह मारकर गुजारा करना पड़ रहा है। कई बार तो ये गंदगी भरी पोलीथीन उनके जीवन के लिए इतनी घातक बन जाती हैं उन्हें तड़प-तडपकर मरते देखा गया है। मोदी सरकार से पूर्व कांग्रेस सरकार ने भी अपने साठ वर्ष के कार्यकाल में गौमाता को सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ा हुआ था और अब मोदी सरकार भी उसके खाने का पुख्ता प्रबंध नहीं करती दिख रही है। अभी भी गौमाता पहले की तरह ही कूड़े के ढेरों में ही मुंह मारकर अपना पेट भरती दिखाई पड़ रही हैं। दूसरी तरफ गाय और गौशालाओं के नाम पर सरकार से अनुदान लेकर कुछ लोग खूब मौज ले रहे हैं। गऊशालाओं के नाम पर चंदा उगाही तो जैसे गौशालाओं का जन्म सिद्ध अधिकार ही बन गया है। फसल के दौरान तो ये लोग और भी सक्रिय हो जाते हैं। आज़-कल जहां देखो गौशाला के लिए चंदा लेने वालों की भीड़ लगी रहती है। राजस्थान में राज्य सरकार से अनुदान ना मिलने पर गऊशाला संचालकों ने सरकार के खिलाफ गत कुछ दिनों से एक अभियान चलाया हुआ है। गऊशाला संचालक वैसे भी चंदे के नाम पर आम से लेकर खास आदमी तक को ख़ूब चूना लगा रहे हैं। क्योंकि इनसे कोई हिसाब मांगने वाला भी नहीं होता। ऐसा नहीं है कि सारे के सारे लोग ही चन्दा चोर हैं कुछ लोग वास्तव में गऊ माता की सेवा में भी लगे हुए हैं मैं उनकी बात नहीं कर रहा। लेकिन इन वास्तव में गऊमाता की सेवा करने वाले गौभक्तों की आड़ में कुछ प्रोफेशनल लोग भी इस काम में आ‌ गये हैं जो देश और समाज को लूटने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं। इन प्रोफेशनल लोगों ने इस चन्दे के धंधे को ही अपना फुल टाइम बिजनेस बना लिया है। इन चन्दा चोरों की लाइफ स्टाइल को देखते हुए अब इस चन्दे के धंधे में बड़े-बडे बिजनेस टायकून भी उतर आये है। इन सबका काम स्पष्ट रहता है कि सबसे पहले देश के बडे-बडे अखबारों में गऊमाता के चारे की समस्या की समस्या को उजागर करो और फिर उस चारे के लिए व्यापारियों के पास दान लेने के लिए पहुंच जाओ। इनका चन्दा उघाने का यही एकमात्र धंधा रह गया है। ये इस काम के इतने माहिर होते हैं कि गऊशालाओं को दान देने वालों के लिए इन्कम टैक्स बचाने से लेकर उनकी आमदनी की सारी जानकारी अपने पास रखते हैं। पहले ये लोग चार्टेड अकाउंटेंट से व्यापारियों के आय-व्यय का लेखा-जोखा ले लेते हैं ।आय-व्यय का लेखा-जोखा होने के कारण व्यापारी भी इनको गऊशालाओं के नाम पर दान देने से मना नहीं कर पाते। ये लोग ऐसा‌ जाल बुनते हैं कि पहले व्यापारियों को सामाजिक प्रतिष्ठा का गीदड़ बिल्ला पकड़ा देते हैं  जिसको लेकर व्यापारी इनको दान देने में आनाकानी नहीं कर पाता। व्यापारियों को बाद में वह गिदड बिल्ला उनके व्यापारिक प्रतिष्ठान की शोभा बढ़ाने के काम भी आता है। इस गीदड़ बिल्ले को देखकर अन्य व्यापारी भी इन दान लेने वालों के झांसे में आ जाते हैं। आज़कल तो ये प्रोफेशनल गऊशालाओं के लिए बड़ी-बडी कम्पनियों से भी सीएसआर का बजट भी लेने लग गये हैं। इन गौशाला चलाने वाले व्यापारियों का गऊओं की सेवा से कोई सरोकार नहीं होता बल्कि ये इस काम को एक व्यापारी की तरह अंजाम देते हैं। इसलिए गाहे-बगाहे गौशालाओं में बदइंतजामी के समाचार मिलते रहते हैं। क्योंकि इन गाय के नाम पर व्यापार करने वाले व्यापारीयों की गौसेवा करने की कोई इच्छा ना होकर एक मात्र मकसद गऊ माता के नाम पर सरकार से अनुदान लेना और गौभक्तों से चंदा उगाही करना ही रहता है। ज्यादातर गौशालाओं में गऊ माता आज नारकीय जीवन जी रही हैं। इसका मुख्य कारण सरकार की वो नीतियां हैं जिसका ये लोग फायदा उठाते हैं। ये नीतियां ही इन गऊशालाओं के नाम पर मौज उड़ा रहे लोगों को पाल-पोश‌ रही हैं। ये लोग सरकार से अनुदान और गौभक्तों से चन्दा उघाकर भी जब गऊ माता की सम्भाल नहीं कर सकते तो सभी गऊभक्तों को दुःख महसूस होता है। मुझे लगता है कि यदि मोदी सरकार इन गऊशाला खोलकर बैठे व्यापारियों की जगह देश के किसानों को गाय पालने पर अनुदान देना शुरू कर दें तो गऊ माता की सेवा भी होने लग जायेगी और शहर की सड़कों पर मारी फिर रही गऊ माता के भोजन का समाधान भी हो जायेगा। अगर सरकार गौशालाओं की जगह किसान को गाय पालने के लिए अनुदान शुरू कर दें तो इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि गऊ माता गांव में किसान के घर रहेगी और उसे किसान से चारा मिलना शुरू हो जायेगा जिससे उसे शहर का कूड़ा-कचरा नहीं खाना पड़ेगा। दूसरा इन गऊशाला के नाम पर अनुदान हड़पने वाले डाकूओं से सरकार को निजात मिलेगी। तीसरी बात किसानों की आमदनी बढ़ेगी तो अन्नदाता की आर्थिक स्थिति अच्छी हो जायेगी। चौथा शहरों के अन्दर कूड़ेदानों में गायों को पोलीथीन में खाना खोजने नहीं निकलना पड़ेगा इससे शहर में सड़कों पर गाय और सांडों से होने वाली दुर्घटनाएं भी नहीं होंगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी किसान की आय बढ़ाने के प्रयास कर रहे हैं। यदि मोदी जी वास्तव में किसानों की आय बढाना चाहते हैं तो अमेरिका,स्वीडन, डेनमार्क, जर्मनी और आस्ट्रेलिया की तर्ज पर किसानों को गाय पालने और उनके रखरखाव के लिए एक अनुदान राशि का निर्धारण करके किसानों की आर्थिक सहायता कर सकते हैं। इससे एक तो किसान की आय बढ़ेगी और दूसरा  उसको रोजगार की तलाश में शहर की तरफ नहीं भागना पड़ेगा। इससे लोगों का गांव से पलायन रुकेगा और देश को शहरीकरण की भीड़ से निजात मिलेगी। किसान की आर्थिक हालत सुदृढ़ हो जायेगी। आर्थिक हालत सुधर जाने से उसको किसी दूसरे के ऊपर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। देश गांधी जी के सपनों का भारत बनेगा। गांव की लक्ष्मी गांव में रुक जायेगी और हमारी रीढ़ की हड्डी गांव मजबूत हो जायेंगे। गौमाता को संरक्षण मिल जाएगा। तीसरी बात गौशालाओं के नाम पर अनुदान और दान लेकर भ्रष्टाचार करने वालों पर नकेल कसी जाएगी। मोदी जी जिस भ्रष्टाचार को रोकने के प्रयास में लगे हैं उसमें भी सहायता मिलेगी। देश का किसान मजबूत होगा तो मजदूर अपने आप मजबूत हो