परिवारों के विखंडन से प्रभावित होता बचपन

परिवारों के विखंडन के इस दौर में सबसे अधिक बचपन प्रभावित हुआ है। दादा-दादी, नाना-नानी के संरक्षण में कहानियां सुनने वाला बचपन अब कंप्यूटर, इंटरनेट, टीवी, वीडियो और मोबाइल गेम्स जैसे संचार माध्यमों के बीच की मशीनी दुनिया के साथ विकसित हो रहा है। बच्चों के इस मनो-शारीरिक विकास में दैहिक समाज नदारद है। आज आर्थिक दबावों के समक्ष माता-पिता को भी इतनी फुरसत नहीं है, जो बच्चे को यह बता सकें कि जीवन में उसके लिए चीजों को चयन करने की दिशा क्या होगी। बच्चों को अपने सामने बिठा कर संस्कृति और सांस्कृतिक मूल्यों की सीख देने वाले परिवार और स्कूल भी उनसे दूर हो रहे हैं। बच्चों का बचपन मनोरंजन की दैहिक दुनिया से छिटककर संचार माध्यमों की दुनिया तक सिमट रहा है, जहां उनके मनपसंद कार्यक्रम चयन का अपना भरा-पूरा यांत्रिक संसार है। बच्चों के विवेक हरण एवं चेतना के दमन का कार्य करते हुए ये सभी साधन उनके जीवन को रोमांचक बना रहे हैं। इसी दौरान कभी-कभी टास्क बेस्ड रोमांच उन्हें आत्मघात की ओर भी ले जाता है। पारस्परिकता, वैयक्तिकता, प्रेम, बंधुत्व, मनुष्यता, सहानुभूति एवं मानवीय संवेदना जैसे मूल्यों का अभाव है। इससे सबसे अधिक बच्चों का बचपन ही प्रभावित हो रहा है। संचार माध्यमों ने इन बच्चों को भी उपभोक्ता बना कर रख दिया है। परिणामस्वरूप बच्चे भी इस बाजार की गलाकाट होड़ का हिस्सा बनते जा रहे हैं। बच्चों की इस पीढ़ी में सफलता प्राप्त करने की तीव्र इच्छा तो है, परंतु जीवन में असफलता की स्थिति में धैर्य एवं संयम का पूर्णतः अभाव है। डिजिटल मीडिया ने उनके ज्ञानात्मक पक्ष के विवेक को शून्य कर दिया है। बच्चों के जीवन का यह नूतन आयाम बहुत गंभीर चिंता का विषय है। बच्चों के जीवन से इस रोमांच के साथ-साथ स्क्रीन टाइम को कम करने के लिए आवश्यक है कि उनके एकाकीपन, तनाव, निराशा एवं कुंठा से जुड़ी चुनौतियों को उनकी रचनात्मक गतिविधियों में बदला जाए। बच्चों और युवाओं के बीच डिजिटल लत तेजी से एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है और इसका सीधा असर उनकी मानसिक सेहत पर पड़ रहा है। अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के विकास को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। इस उम्र में समाज और परिवार की वास्तविक दुनिया को छोड़कर आभासी दुनिया, गेमिंग और डिजिटल मीडिया की गिरफ्त में आकर बचपन हिंसा की ओर मुड़ चला है। आस्ट्रेलिया और फिनलैंड में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इंटरनेट मीडिया पर प्रतिबंध के लिए कानून लागू हैं। फ्रांस की नेशनल असेंबली में ऐसा कानून लाने पर सहमति बन चुकी है। ब्रिटेन, डेनमार्क और ग्रीस भी इससे जुड़ा कानून बनाने की तैयारी में हैं। भारत में एक अरब से अधिक इंटरनेट यूजर्स हैं। इनमें से 50 करोड़ से अधिक यूट्यूब, 40 करोड़ से अधिक फेसबुक तथा 48 करोड़ से अधिक इंस्टाग्राम यूजर हैं। इंटरनेट मीडिया के इन प्लेटफार्म्स पर 75 प्रतिशत से अधिक यूजर्स कम उम्र के हैं। इसके कारण उनमें नींद की कमी, कम एकाग्रता, घबराहट, अवसाद एवं आत्मविश्वास में कमी और साइबर बुलिंग के मामले भी सामने आ रहे हैं। इनके कारण बच्चों का शैक्षणिक प्रदर्शन भी लगातार प्रभावित हो रहा है।