वीर शिरोमणि भड़ माधोसिंह भण्डारी: एक अमर कथा

हिमालय की ऊँची-नीची पर्वत-शृंखलाओं के मध्य, जहाँ शिलाएँ मौन तपस्या करती हैं और नदियाँ युगों की स्मृति बहाती हैं, वहीं केदारखंड की पावन गढ़भूमि स्थित है। यह भूमि केवल देवताओं की नहीं रही, यह वीरों की भी रही है—ऐसे वीर, जिनका जीवन तलवार से अधिक कर्तव्य से और युद्ध से अधिक जनकल्याण से आलोकित रहा। इसी गढ़भूमि ने एक ऐसे युगपुरुष को जन्म दिया, जिसे इतिहास वीर शिरोमणि भड़ माधोसिंह भण्डारी के नाम से जानता है।
यह कथा आरम्भ होती है काली कुमाऊँ से। माना जाता है कि भण्डारी वंश के पूर्वज चम्पावत की काली कुमाऊँ से गढ़वाल की ओर आए थे। कत्यूर वंश के शासनकाल में परमार क्षत्रियों को राज्य की युद्ध-नीति के साथ-साथ अन्न, रसद और धन-भण्डारण की व्यवस्था का दायित्व सौंपा गया था। इन्हीं उत्तरदायित्वों के कारण परमार योद्धा जनमानस में “भण्डारी” कहलाए। कालांतर में यही वंश लस्या पट्टी के लखनापुर–लालुड़ी ग्राम में आकर स्थिर हुआ।
इसी वंश में जन्मे भड़ राय रावसिंह भण्डारी, जो आगे चलकर काला भण्डारी के नाम से विख्यात हुए। काली कुमाऊँ से आए होने के कारण “काला” विशेषण उनके नाम से जुड़ा और शीघ्र ही यह नाम वीरता, स्वाभिमान और विजय का पर्याय बन गया। काला भण्डारी केवल पराक्रमी योद्धा ही नहीं थे, बल्कि एक समृद्ध, जनप्रिय और गौरवमय व्यक्तित्व के स्वामी थे। गढ़देश ही नहीं, सीमांत राज्यों तक उनके नाम की विशेष धाक थी।
काला भण्डारी के जीवन में वैभव था, साहस था, और रंगमिजाजी भी। लोककथाओं में वर्णन आता है कि एक बार उनके स्वप्न में नवली गढ़ की रूपसी सुंदरी ध्यानमाला प्रकट हुई। स्वप्न का प्रभाव इतना गहरा था कि वे नवली गढ़ पहुँचे और एक पनघट पर उनकी भेंट ध्यानमाला से हुई। यह प्रसंग उनके व्यक्तित्व के उस मानवीय पक्ष को उजागर करता है, जहाँ कठोर रणवीर के भीतर सौंदर्य और संवेदना भी जीवित थी।
काला भण्डारी का पारिवारिक जीवन भी उतना ही अनुशासित था जितना उनका रणजीवन। उनकी पत्नी उत्तरा, जिन्हें लोग श्रद्धा से शेरणी कहते थे, साहस, करुणा और विवेक की मूर्ति थीं। इन्हीं माता-पिता के संस्कारों में तीन पुत्र पले—माधोसिंह, भावसिंह और शायदसिंह।
लालुड़ी ग्राम का आँगन इन बालकों के लिए खेल का मैदान नहीं, बल्कि वीरता की पाठशाला था। बचपन से ही उन्हें धनुष-बाण, तलवार, भाला, ढाल, कुश्ती और मल-युद्ध का अभ्यास कराया जाता। कठोर पर्वतीय अंचलों में घोड़ों के साथ दौड़ लगवाना, ऊँची चट्टानों से छलांग लगवाना, दुर्गम पथों पर निर्भीक चलना—ये सब उनके खेल थे, जिनमें भय के लिए कोई स्थान नहीं था। काला भण्डारी कहते थे—
“वीर वही है जो विपत्ति में भी विवेक न खोए।”
माधोसिंह बचपन से ही गंभीर, दूरदर्शी और नेतृत्वशील थे। माता उत्तरा के प्रति उनका स्नेह और सेवा-भाव अद्वितीय था। यही कारण था कि एक दिन माता ने उनके धैर्य और संकल्प की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने स्वयं को अस्वस्थ बताया और कहा कि उन्हें घराट से पिसे आटे की बीट का सत्तू खाने की इच्छा है—जबकि उस क्षेत्र में जलाभाव के कारण घराट चलना असंभव था।
माधोसिंह ने इसे माता का आदेश और ईश्वर की आज्ञा माना। मात्र सोलह–सत्रह वर्ष की आयु में उन्होंने अपने दोनों भाइयों और गाँव के साथियों को संग लिया और हिलौंऊ की गाड़ से लालुड़ी तक कूल (नहर) निकालने का संकल्प किया। कठोर चट्टानों को काटते हुए, दिन-रात के अथक श्रम से जलधारा बह निकली। घराट चला, माता की इच्छा पूरी हुई, और साथ ही लालुड़ी की सूखी भूमि सिंचित हो उठी। यह केवल मातृभक्ति नहीं थी—यह जनकल्याण की शुरुआत थी।
माधोसिंह पशुधन के संरक्षण के साथ-साथ कृषि में भी निपुण थे। उन्होंने पहाड़ी ढलानों को काटकर सीढ़ीनुमा खेत बनाए, जिससे जल-संरक्षण हुआ और भूमि उपजाऊ बनी। उनके लिए कुदाल भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण थी जितनी तलवार।
युवावस्था में माधोसिंह भण्डारी ने गढ़राज्य की सीमाओं की रक्षा और विस्तार का दायित्व सँभाला। हटती घाटी के पार तिब्बत की ओर फैले ढालू मैदानों में स्थित दापा घाटी के किले को जीतकर उन्होंने गढ़वाल राज्य की उत्तरी सीमा सतलज नदी तक स्थापित की। यह विजय केवल सैन्य नहीं थी, यह गढ़राज्य की संप्रभुता की उद्घोषणा थी।
इस पराक्रम से प्रसन्न होकर गढ़ नरेश महिपति शाह ने उन्हें “वीर शिरोमणि भड़ माधोसिंह भण्डारी” की उपाधि दी और मलेथा गाँव का समूचा क्षेत्र, पिलखी तथा जाखी गढ़ सहित अन्य जागीरें प्रदान कीं।
माधोसिंह का जीवन केवल रण और निर्माण तक सीमित नहीं था। गडौल्य गढ़ की उदीना बौराण के साथ उनका प्रेम भी उतना ही गहन था। युद्ध-विजय के पश्चात धर्मसम्मत मल-युद्ध द्वारा उन्होंने उदीना को पत्नी के रूप में स्वीकार किया। आगे चलकर पारिवारिक संघर्षों के कारण माता उत्तरा के निर्णय से उदीना मलेथा पहुँचीं, जहाँ अभाव और संघर्ष के बीच उनके पुत्र वीरसिंह का जन्म हुआ।
मलेथा की कूल और छैंणा (सुरंग) के निर्माण में वीरसिंह का बलिदान लोककथाओं में अमर हो गया। यह बलिदान माधोसिंह के जीवन की सबसे करुण गाथा बन गया।
अंततः सीमांत क्षेत्रों से लौटते समय, कैरखाल के निकट वीर भड़ माधोसिंह भण्डारी वीरगति को प्राप्त हुए। पर वे मृत्यु से परे हो चुके थे। आज भी गढ़भूमि में कहा जाता है—
“एक सिंह रण-बण, एक सिंह गाईका।
एक सिंह माधोसिंह, और सिंह काहैका।”
यह कथा केवल एक व्यक्ति की नहीं, यह गढ़भूमि की आत्मा की कथा है—जहाँ तलवार से सीमाएँ रची गईं और कुदाल से जीवन सँवारा गया।
लेख- वीरेन्द्र सिंह भण्डारी
ग्राम-सरूणा पट्टी ग्यारह गाँव हिन्दाऊ घनसाली वि० भीलंगना जनपद टिहरी गढ़वाल (उत्तराखण्ड)

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