ललित गर्ग। भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में यूपीआई अब महज भुगतान का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि रोजमर्रा के आर्थिक व्यवहार का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। सब्जी वाले से लेकर बड़े कारोबारी तक, टैक्सी से ऑनलाइन खरीदारी तक और घरेलू लेन-देन से व्यावसायिक भुगतान तककृयूपीआई ने पैसे के लेन-देन की आदत, गति और भाषा तीनों बदल दी हैं। ऐसे में यूपीआई से जुड़े शुल्क की व्यवस्था केवल बैंकिंग या फिनटेक कंपनियों का कारोबारी विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध उपभोक्ता की आदत, छोटे कारोबार की लागत और भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की दिशा से है।
सितंबर 2026 में स्पष्ट किए गए नए ढांचे के अनुसार व्यक्ति से व्यक्ति यानी पी2पी यूपीआई भुगतान किसी भी राशि पर निःशुल्क रहेगा। 2,000 रुपये तक के व्यापारी भुगतान पर भी एमडीआर नहीं है। 2,000 रुपये से अधिक के कुछ पी2एम यानी ग्राहक से व्यापारी भुगतान पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर का प्रावधान किया गया है। 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेन-देन पर प्रति लेन-देन अधिकतम 300 रुपये की सीमा भी रखी गई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह ग्राहक से सीधे वसूला जाने वाला लेन-देन शुल्क नहीं, बल्कि व्यापारी-पक्ष का एमडीआर है।
फिर भी इस बदलाव को केवल ‘शुल्क लगा या नहीं लगा’ के सवाल तक सीमित करना उचित नहीं होगा। असली प्रश्न यह है कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लंबे समय तक टिकाऊ कैसे बनाया जाए और उसकी लागत किसके हिस्से में जाए। यूपीआई की सफलता का सबसे बड़ा कारण इसकी सरलता और लगभग बिना लागत की अनुभूति रही है।
अगस्त 2026 में यूपीआई पर करीब 24.51 अरब लेन-देन हुए, जिनका कुल मूल्य लगभग 29.82 लाख करोड़ रुपये रहा। यह आंकड़ा बताता है कि यूपीआई अब किसी वैकल्पिक भुगतान माध्यम की श्रेणी में नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक जीवन के बुनियादी ढांचे का हिस्सा बन चुका है।
यूपीआई के विस्तार के साथ एक बड़ा मनोवैज्ञानिक बदलाव भी आया है। लोगों ने डिजिटल भुगतान को केवल सुविधा नहीं, बल्कि स्वाभाविक व्यवहार मान लिया है। पहले दस, पचास या सौ रुपये के भुगतान के लिए जेब से नकद निकालना सामान्य था, आज वही भुगतान मोबाइल से कुछ सेकंड में हो जाता है। जब कोई सेवा वर्षों तक निःशुल्क उपलब्ध रहती है, तो उपभोक्ता उसके पीछे मौजूद तकनीकी, बैंकिंग और साइबर सुरक्षा की लागत को लगभग भूल जाता है। इसलिए बाद में किसी शुल्क या लागत की चर्चा सामने आने पर स्वाभाविक रूप से असहजता पैदा होती है।
यहीं आधुनिक बाजार व्यवस्था की एक बड़ी विसंगति दिखाई देती है। अनेक डिजिटल और उपभोक्ता सेवाएं शुरुआत में मुफ्त, बेहद सस्ती या भारी छूट के साथ उपलब्ध कराई जाती हैं। उपभोक्ता उस सुविधा का अभ्यस्त होता है, उसका व्यवहार बदलता है और बाजार में सेवा के मजबूत होने के बाद लागत की नई संरचना सामने आती है। ओला-उबर जैसी सेवाओं से लेकर ऑनलाइन व्यापार, डिजिटल सदस्यता और विभिन्न प्लेटफॉर्म सेवाओं तक इस मॉडल के अलग-अलग रूप देखे जा सकते हैं।
यह कहना उचित नहीं होगा कि हर मामले में यही रणनीति अपनाई जाती है, लेकिन उपभोक्ता के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर उठता हैकृयदि किसी सेवा की दीर्घकालिक लागत है, तो उसकी जानकारी शुरुआत से स्पष्ट क्यों न हो? यूपीआई के मामले में यह प्रश्न और महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके उपयोगकर्ता केवल शहरी मध्यमवर्ग तक सीमित नहीं हैं। छोटे दुकानदार, स्ट्रीट वेंडर, घरेलू उद्यमी, ग्रामीण उपभोक्ता और पहली बार बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ने वाले लोग भी इसके बड़े हिस्से हैं।
सरकार की 2025 की प्रोत्साहन योजना में भी छोटे व्यापारियों के 2,000 रुपये तक के भीम-यूपीआई भुगतान को शून्य एमडीआर के दायरे में रखते हुए 1,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। इसका उद्देश्य छोटे व्यापारियों के बीच डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना और भुगतान ढांचे को मजबूत करना था।
इसलिए शुल्क की किसी भी व्यवस्था का पहला सिद्धांत होना चाहिएकृछोटे भुगतान और छोटे कारोबार की रक्षा। 100, 500 या 1,000 रुपये जैसे छोटे भुगतानों पर अतिरिक्त लागत बढ़ाने वाला मॉडल डिजिटल समावेशन की भावना के विपरीत जा सकता है। इसके विपरीत बड़े व्यावसायिक भुगतानों से जुड़ी लागत को अलग तरीके से देखा जा सकता है, बशर्ते शुल्क पारदर्शी, सीमित और पहले से घोषित हो तथा उसका भार अनुचित रूप से ग्राहक पर न डाला जाए।
यहां डेबिट और क्रेडिट कार्ड का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। यूपीआई के व्यापक प्रसार ने रोजमर्रा के छोटे भुगतानों में कार्ड के उपयोग को पीछे धकेला है। यदि यूपीआई के कुछ बड़े व्यापारी लेन-देन पर लागत बढ़ती है, तो कुछ कारोबारी वैकल्पिक भुगतान माध्यमों की ओर देख सकते हैं। कार्ड, नेट बैंकिंग, वॉलेट और अन्य डिजिटल माध्यम फिर कुछ क्षेत्रों में अधिक सक्रिय हो सकते हैं।
इससे भुगतान बाजार में विविधता बढ़ सकती है, लेकिन यदि उपभोक्ता को हर माध्यम में अलग-अलग शुल्क, सुविधा और शर्तों का सामना करना पड़े, तो डिजिटल भुगतान की सबसे बड़ी ताकतकृसरलताकृकमजोर भी हो सकती है। इसलिए प्रतिस्पर्धा का उद्देश्य केवल भुगतान का माध्यम बदलना नहीं, बल्कि उपभोक्ता को बेहतर और अधिक पारदर्शी विकल्प देना होना चाहिए।
दूसरी ओर यूपीआई को मुफ्त बनाए रखने की भी एक कीमत है। भुगतान प्रणाली को चैबीसों घंटे सुचारु रूप से चलाने के लिए बैंकिंग सर्वर, डेटा सेंटर, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने वाली प्रणालियां, ग्राहक सहायता और तकनीकी उन्नयन पर लगातार खर्च होता है। जैसे-जैसे लेन-देन की संख्या बढ़ती है, वैसे-वैसे क्षमता, विश्वसनीयता और सुरक्षा में निवेश की आवश्यकता भी बढ़ती है।
सरकार की 2025 की योजना में तकनीकी विफलताओं को कम करने और सिस्टम अपटाइम सुधारने को प्रोत्साहन से जोड़ा गया था। इससे स्पष्ट है कि भुगतान प्रणाली को केवल मुफ्त बनाए रखना ही पर्याप्त नहीं हैय उसे विश्वसनीय, सुरक्षित और तकनीकी रूप से सक्षम बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि यूपीआई की हर सेवा हमेशा मुफ्त रहे या नहीं। असली सवाल यह होना चाहिए कि उसकी लागत का न्यायपूर्ण और पारदर्शी वितरण कैसे हो। सरकार, बैंक, फिनटेक कंपनियां और भुगतान नेटवर्क यदि इस व्यवस्था से आर्थिक लाभ लेते हैं, तो उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सुरक्षा, विश्वसनीयता और नवाचार पर पर्याप्त निवेश हो। शुल्क का उद्देश्य केवल राजस्व जुटाना नहीं, बल्कि बेहतर डिजिटल भुगतान व्यवस्था के निर्माण से जुड़ा होना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा उपभोक्ता विश्वास का है। डिजिटल अर्थव्यवस्था विश्वास पर चलती है। यदि किसी सेवा को आज ‘मुफ्त’ बताया जाए और कल उसकी लागत अचानक सामने आए, तो उपभोक्ता में असहजता और अविश्वास पैदा हो सकता है। इसलिए भविष्य में किसी भी डिजिटल भुगतान व्यवस्था की शुरुआत करते समय उसकी संभावित लागत, शुल्क संरचना और उसे लागू करने की परिस्थितियां पहले से स्पष्ट होनी चाहिए। उपभोक्ता को यह पता होना चाहिए कि कौन-सी सेवा निःशुल्क है, किस सेवा पर लागत है, लागत कौन वहन करेगा और उसका अधिकतम स्तर क्या होगा। पारदर्शिता जितनी अधिक होगी, व्यवस्था पर भरोसा उतना ही मजबूत रहेगा।
भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार कर रहा है। ऐसे समय में यूपीआई की सफलता को केवल लेन-देन की संख्या से नहीं, बल्कि उसकी स्थिरता, सुरक्षा, पहुंच और उपभोक्ता विश्वास से भी मापा जाना चाहिए। भारत की दीर्घकालिक विकास-यात्रा के लिए उत्पादकता, नवाचार और मजबूत डिजिटल आधारभूत ढांचा महत्वपूर्ण हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भी भारत की उत्पादकता और नवाचार क्षमता को दीर्घकालिक विकास से जोड़ता रहा है। यूपीआई शुल्क की बहस इसलिए वास्तव में ‘शुल्क बनाम मुफ्त’ की बहस नहीं है। यह उस आर्थिक दर्शन की परीक्षा है, जिसमें डिजिटल सुविधा आम आदमी तक सस्ती, सरल और सुरक्षित रूप में पहुंचती है।
छोटे भुगतान मुफ्त रहें, छोटे व्यापारियों पर अनावश्यक भार न पड़े, बड़े व्यावसायिक लेन-देन में लागत की तार्किक व्यवस्था हो, शुल्क की जानकारी पहले से सार्वजनिक हो और उससे प्राप्त संसाधनों का इस्तेमाल भुगतान प्रणाली की सुरक्षा व क्षमता बढ़ाने में होकृऐसा संतुलन ही टिकाऊ रास्ता हो सकता है।
भारत को डिजिटल भुगतान का विस्तार रोकना नहीं, बल्कि उसकी अगली पीढ़ी तैयार करनी है। यूपीआई की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने भुगतान को बैंक की शाखा और बटुए की सीमा से निकालकर मोबाइल की स्क्रीन तक पहुंचा दिया है। अब अगली चुनौती यह है कि यह सुविधा आर्थिक रूप से टिकाऊ भी रहे और आम उपभोक्ता के लिए सहज भी बनी रहे।
ृ दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा रखने वाले भारत में डिजिटल भुगतान केवल तकनीक नहीं, बल्कि आर्थिक जीवन की धड़कन है। इसलिए इसकी कीमत तय करते समय बाजार की कमाई से अधिक महत्वपूर्ण होना चाहिएकृउपभोक्ता का विश्वास, छोटे कारोबार की क्षमता और डिजिटल भारत की दीर्घकालिक विश्वसनीयता।