भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून में 37वां वार्षिक अनुसंधान सेमिनार संपन्न, जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण पर हुआ मंथन

-दो दिवसीय कार्यक्रम में 60 से अधिक शोध पत्र और 41 पोस्टर प्रस्तुत किए गए

देहरादून: पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भारत सरकार के अंतर्गत भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून द्वारा आयोजित दो दिवसीय 37वां वार्षिक अनुसंधान सेमिनार 2026 का मंगलवार को सफलतापूर्वक समापन हुआ। इस सेमिनार में शोधकर्ताओं, वन्यजीव पेशेवरों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, संरक्षण विशेषज्ञों, छात्रों एवं अन्य हितधारकों ने भाग लिया और वन्यजीव विज्ञान तथा जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में उभरती चुनौतियों एवं प्रगति पर विचार-विमर्श किया।

वर्ष 1986 में अपनी शुरुआत के बाद से ही, वार्षिक अनुसंधान सेमिनार वैज्ञानिक अनुसंधान के प्रदर्शन, ज्ञान के आदान-प्रदान और वन्यजीव संरक्षण एवं प्रबंधन में सहयोगात्मक प्रयासों को सुदृढ़ करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में कार्य कर रहा है। 37वें संस्करण ने इस परंपरा को जारी रखते हुए शोधकर्ताओं और संरक्षण विशेषज्ञों को वन्यजीव और जैव विविधता संरक्षण की समकालीन चुनौतियों के लिए अपने नवीनतम निष्कर्षों, अभिनव दृष्टिकोणों तथा साक्ष्य-आधारित समाधानों को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया।

भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ वन्यजीव वैज्ञानिक डॉ. जी. एस. रावत ने इस वार्षिक अनुसंधान सेमिनार की अध्यक्षता की। दो दिवसीय कार्यक्रम के दौरान 60 से अधिक शोध पत्र और 41 पोस्टर प्रस्तुत किए गए, जो संस्थान में चल रहे शोध की व्यापकता, गहनता तथा वन्यजीव विज्ञान एवं संरक्षण में इसके योगदान को दर्शाते हैं। उद्घाटन सत्र का एक प्रमुख आकर्षण भारतीय वन्यजीव संस्थान के संकाय सदस्यों और शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किए गए पांच प्रकाशनों का विमोचन रहा।

सेमिनार में आठ तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनकी अध्यक्षता वन्यजीव विज्ञान और संरक्षण क्षेत्र के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों ने की। इन सत्रों में समकालीन अनुसंधान विषयों की विस्तृत श्रृंखला को शामिल किया गया, जिनमें पारिस्थितिक अध्ययन, संरक्षण और विकास, बड़े स्तनधारियों पर दीर्घकालिक शोध, जनसंख्या आकलन, पर्यावरणीय बदलावों के बीच जैव विविधता, तथा पुनर्स्थापना एवं जनसंख्या लचीलापन (पॉपुलेशन रेजिलिएंस) जैसे विषयों पर वैज्ञानिक चर्चाएं हुईं। जिसके विषय रिकवरी, रीइंट्रोडक्शन एंड पॉपुलेशन रेजिलिएंस, स्पीशीज, हैबिटैट्स एंड इमर्जिंग कंजर्वेशन चैलेंजेस, लैंडस्केप चेंज, कनेक्टिविटी एंड डेवलपमेंट, स्पीड टॉक्स, पॉपुलेशन एस्टीमेशन: फ्रॉम इंडिविजुअल्स टू सोशल पॉपुलेशंस, बायोडायवर्सिटी अंडर एनवायरनमेंटल चेंज, ह्यूमन-वाइल्डलाइफ कोएग्जिस्टेंस एंड कन्फ्लिक्ट रहे।

इन सत्रों ने प्रभावी एवं विज्ञान-आधारित वन्यजीव संरक्षण दृष्टिकोण विकसित करने के लिए अंतःविषय अनुसंधान (इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च), तकनीकी नवाचार, दीर्घकालिक पारिस्थितिक अध्ययन और वैज्ञानिकों, संरक्षण विशेषज्ञों व अन्य हितधारकों के बीच परस्पर सहयोग के महत्व पर बल दिया।

डॉ. जी. एस. भारद्वाज, भारतीय वन सेवा, निदेशक, भारतीय वन्यजीव संस्थान ने कहा कि “भारतीय वन्यजीव संस्थान का वार्षिक अनुसंधान सेमिनार देश की समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण के प्रति संस्थान के विविध प्रयासों को प्रदर्शित करता है। यह सेमिनार संस्थान के व्यापक शोध प्रयासों को प्रस्तुत करने का एक जीवंत मंच है और शोधकर्ताओं व संकाय सदस्यों को विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों और पेशेवरों से बहुमूल्य प्रतिक्रिया प्राप्त करने का अवसर देता है।”

डॉ. जी. एस. रावत, पूर्व निदेशक एवं प्रतिष्ठित वैज्ञानिक कहा कि “मैं युवा वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और पीजी डिप्लोमा प्रशिक्षु अधिकारियों से वार्षिक अनुसंधान सेमिनार में सक्रिय रूप से भाग लेने का आह्वान करता हूं। संरक्षण पद्धतियों को आकार देने में भारतीय वन्यजीव संस्थान और वन्यजीव शोधकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका है।”

डॉ. बिवाश पांडव, शोध समन्वयक, भारतीय वन्यजीव संस्थान कहा कि “सेमिनार के दौरान प्रस्तुत अनुसंधान संस्थान के शैक्षणिक और अनुसंधान समुदाय के समर्पण, विविधता और गतिशीलता को दर्शाता है। पारंपरिक ज्ञान का समकालीन वैज्ञानिक दृष्टिकोणों के साथ एकीकरण, स्थानीय समुदायों की सार्थक भागीदारी, और उभरती तकनीकों का प्रभावी उपयोग संरक्षण विज्ञान को आगे बढ़ाने में संस्थान द्वारा अपनाए गए समग्र दृष्टिकोण को दर्शाता है।”

श्री रमेश कुमार पांडे, भारतीय वन सेवा, अपर वन महानिदेशक (वन्यजीव), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, नई दिल्ली ने कहा कि “वार्षिक अनुसंधान सेमिनार केवल एक वार्षिक सम्मेलन नहीं है; मैं इसे विचारों, आंकड़ों, पद्धतियों और परिणामों का एक पारिवारिक पुनर्मिलन मानता हूं। प्रोफेसर, वन अधिकारी, पीएचडी स्कॉलर, एमएससी छात्र और फील्ड असिस्टेंट एक ही छत के नीचे एकत्र होते हैं ताकि विचारों का आदान-प्रदान हो सके, चाहे वह बाघ, हाथी, गोडावण (बस्टर्ड), डुगॉन्ग, हिम तेंदुए, मीठे पानी के कछुए या डॉल्फिन जैसी प्रजातियां हों।” 37वें वार्षिक अनुसंधान सेमिनार का सफल समापन वन्यजीव विज्ञान को आगे बढ़ाने, वैज्ञानिक क्षमता को मजबूत करने और भारत में प्रभावी वन्यजीव संरक्षण एवं सतत जैव विविधता प्रबंधन के लिए साक्ष्य-आधारित ज्ञान का योगदान देने की संस्थान की प्रतिबद्धता को पुनः दोहराता है।