नालासोपारा में ‘तेरी माया’ का शो हाउसफुल, प्रवासी उत्तराखण्डियों ने दिखाया माटी से जुड़ाव

-कल्याण और अंबाला में एक नवंबर को प्रदर्शित होगी उत्तराखण्डी फिल्म

नालासोपारा। उत्तराखण्ड की माटी, लोकसंस्कृति, परंपराओं और अपनेपन की भावनाओं को समर्पित उत्तराखण्डी फिल्म ‘तेरी माया’ को मुंबई महानगर और आसपास के क्षेत्रों में प्रवासी उत्तराखण्डी समाज का भरपूर स्नेह मिल रहा है। नालासोपारा स्थित फन फिश्टा थिएटर में फिल्म का प्रदर्शन हाउसफुल रहा। दर्शकों के इस उत्साह ने एक बार फिर साबित किया कि अपनी जन्मभूमि, भाषा और सांस्कृतिक विरासत के प्रति उत्तराखण्डवासियों का लगाव आज भी उतना ही गहरा है।

फिल्म से जुड़े वीरेन्द्र सिंह भण्डारी ने नालासोपारा में मिले अपार जनसमर्थन पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले उत्तराखण्डी प्रवासी समाज के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि ‘तेरी माया’ की सफलता केवल एक फिल्म की सफलता नहीं, बल्कि अपनी माटी, बोली, संस्कृति और सामाजिक एकजुटता के प्रति लोगों के अटूट प्रेम का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि मुंबई महानगर और आसपास के विभिन्न क्षेत्रों में फिल्म को दर्शकों का जिस तरह स्नेह और समर्थन मिला है, वह उत्साहजनक है। सिनेमाघरों में दर्शकों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी कहानियां आज भी लोगों के दिलों में विशेष स्थान रखती हैं।

भण्डारी ने फिल्म के प्रदर्शन को सफल बनाने में सहयोग देने वाली सामाजिक संस्थाओं, सांस्कृतिक संगठनों, समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों और संस्कृति के प्रति समर्पित लोगों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि अनेक लोगों ने बिना किसी स्वार्थ के अपना समय, श्रम, संपर्क और सहयोग देकर फिल्म को अधिक से अधिक दर्शकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

नालासोपारा में इन सहयोगकर्ताओं का रहा विशेष योगदान

नालासोपारा में फिल्म के शो को सफल बनाने में जय प्रकाश सभापति, दिनेश अन्थवाल, शम्भूशरण रतूड़ी, कुलदीप बंगारी, नागेन्द्र बंदोनी, लज्जोवती भट्ट, मनोहर सिंह रौथाण, मोहन सिंह बिष्ट, मनीष रावत, दरवान सिंह रावत, देवेन्द्र सिंह नेगी, गजेंद्र सिंह रावत, इंदर सिंह उनियाल, मुकेश रौथाण, बालकृष्ण जोशी और सुरेश काला का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

वीरेन्द्र सिंह भण्डारी ने सभी सहयोगकर्ताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि समाज के लोगों की निःस्वार्थ भागीदारी ने इस आयोजन को यादगार बनाया है। उनके अनुसार, जब समाज अपनी भाषा, संस्कृति और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण के लिए एकजुट होकर आगे आता है, तो सामूहिक प्रयास सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

उन्होंने उन सभी लोगों के प्रति भी कृतज्ञता जताई, जिनके नाम सूची में शामिल नहीं हो सके, लेकिन जिन्होंने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से फिल्म के प्रदर्शन को सफल बनाने में सहयोग दिया।

कल्याण और अंबाला में एक नवंबर को प्रदर्शन

मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में मिल रहे उत्साहजनक समर्थन के बाद फिल्म ‘तेरी माया’ का प्रदर्शन रविवार, एक नवंबर 2026 को कल्याण और अंबाला में भी किया जाएगा।

कल्याण, मुंबई: फिल्म का प्रदर्शन एसएम5 सिनेमा, सर्वोदय मॉल में होगा। यह सिनेमाघर फूल मार्केट के सामने, भानुनगर, कल्याण पश्चिम में स्थित है। आयोजन में बीना भण्डारी, मंगल सिंह कंडारी और हरी सिंह बिष्ट सहयोग कर रहे हैं।

अंबाला, हरियाणा: फिल्म का प्रदर्शन फन गैलेक्सी मॉल, सेक्टर-7, अंबाला में रविवार, एक नवंबर को दोपहर तीन बजे होगा।

भण्डारी ने दोनों स्थानों पर फिल्म के आयोजन से जुड़े सभी सहयोगकर्ताओं को शुभकामनाएं देते हुए विश्वास जताया कि कल्याण और अंबाला में भी उत्तराखण्डी समाज इसी उत्साह और आत्मीयता के साथ फिल्म को अपना स्नेह प्रदान करेगा।

अपनी जड़ों से जुड़ाव का संदेश देती है फिल्म

‘तेरी माया’ को उत्तराखण्डी समाज की भावनाओं, रिश्तों की आत्मीयता और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी कहानी बताते हुए भण्डारी ने कहा कि मनुष्य देश-दुनिया के किसी भी कोने में बस जाए, अपनी जन्मभूमि, बोली, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से उसका रिश्ता कभी समाप्त नहीं होता।

उन्होंने कहा कि मुंबई में प्रवासी उत्तराखण्डी समाज का समर्थन इस बात का प्रमाण है कि भौगोलिक दूरी के बावजूद अपनी माटी के प्रति प्रेम लोगों को एक सूत्र में बांधे रखता है। ऐसी फिल्में नई पीढ़ी को अपनी लोकभाषा, लोककला और परंपराओं से परिचित कराने के साथ उत्तराखण्डी सिनेमा को भी नई पहचान दिलाने में सहायक हैं।

उन्होंने आशा व्यक्त की कि समाज की एकजुटता और सहयोग से उत्तराखण्डी सिनेमा को आगे बढ़ने के नए अवसर मिलेंगे तथा राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत देश के अन्य हिस्सों तक पहुंचेगी।

अंत में भण्डारी ने सभी दर्शकों, आयोजकों और सहयोगकर्ताओं के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करते हुए कहा कि समाज की वास्तविक शक्ति उसके समर्पित लोगों में निहित होती है। अपनी माटी, संस्कृति और सामाजिक गौरव के लिए निःस्वार्थ भाव से आगे आने वाले लोग ही सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखते हैं।