नई दिल्ली। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के सैंडर्स थिएटर मेमोरियल हॉल में चल रही मोरारी बापू की रामकथा के आठवें दिन आध्यात्म, गुरु महिमा और रामचरितमानस के संदेशों की प्रभावशाली प्रस्तुति हुई। कथा के दौरान तुलसी जन्मोत्सव भी मनाया जा रहा है। कार्यक्रम में चित्रकूट के कामदगिरि परिक्रमा क्षेत्र से पधारे महंत पूज्य राम हृदय दास जी महाराज ने अपने विचार व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आप बापु।भगवान श्री राम की घोषणा है सारी सृष्टि पर बराबर दया।पहाड़ों ने बादलों से पूछा कि आप हम पर ही छाए रहते हो लेकिन ठहरते क्यों नहीं?तब बादलों ने कहा आप अकड़ करके खड़े हो,हम वहां ठहरते हैं जहां गहराई होती है। भक्ति,प्रेम,गुरुकृपा की गहराई पर भगवद कृपा रूपी दृष्टि ठहरती है।। प्रभाव सुनने के बाद बोलने की हिम्मत नहीं थी लेकिन बापु का स्वभाव देखकर हिम्मत हुई।।चित्रकूट वो है जहां चारों ओर दरवाजे हैं।।बापु के दरबार में किसी को भी प्रवेश है एसा स्नेह,वात्सल्य,प्रेम,प्यार बापु देते हैं।तुलसी जी को गौरव है कि राम मेरे नायक है,राम को गौरव है तुलसी जैसा भक्त मिलेा और भारत माता को गर्व होगा कि बापु जैसा सुपुत्र मिला।
यहां लगता है की हार्वर्ड विश्वविद्यालय का सभागार नहीं द्वारकानाथ की हवेली लगती है।।अवध कहां जहां रामनिवास हो,जहां बापु बैठ जाए वही सब सभा है बापू के चरणों का आश्रय मुझे यहां लेकर आया है वह आश्रय कभी ना छूटे।अच्छा श्रोता होना ही हमारी योग्यता है।
इस दौरान मोरारी बापू ने कथा शुरू करते हुए कहा साकेत वासी पंडित रामकिंकर जी महाराज ने कहा था:गीता में जो योग है रामचरितमानस में प्रयोग है और हार्वर्ड में ज्ञान की उपासना होती है। ज्ञान को मानस का विज्ञान मिलने आया है।।मानस विज्ञान है।केवल थ्योरी नहीं प्रैक्टिकल है।
प्रश्न तो बहुत आते हैं।एक प्रश्न उठाया: गुरु का अनुराग,वचन,सेवा,सभी प्रसाद कहा गया।अध्यात्म जगत में कोई मुनि,कोई ऋषि है।कोई प्रभु है कोई गुरु है।।यहां शाम को साधु सभा होती है।।ए.आई. का जमाना हमारे दिल और दिमाग को नुकसान ना करें तो ए.आइ. स्वीकार्य है। खुले मन से सबको सुनिए,कुछ नया मिलता है। ताजगी और सादगी कथा के लिए बहुत उपयोगी है।यद्यपि में श्रृंगार का विरोधी नहीं हुं।ताजगी और सादगी लेकर आएंगे तो हनुमान जी परवानगी देंगे।।
साधु का एक लक्षण वो संकोची होता है।।
जय श्री राम आंदोलनात्मक पुकार है,जय सियाराम आनंदोलात्मक पुकार है।एक ऋषि का प्रसाद क्या होता है?रिषी का प्रसाद रुचा है,मुनि का प्रसाद मौन है।देवता स्वर्ग का प्रसाद देते हैं।कुसंग मिले तो नरक का प्रसाद मिलेगा।।
आपके लिए आपके त्रिभुवन दादा ने सबसे अच्छा प्रसाद कौन सा दिया ऐसा पूछा गया।बापु ने बताया मेरा गुरु ही मेरा प्रसाद है।। गुरु ही सबसे बड़ा प्रसाद है।विप्र मिल जाए वह वेद का प्रसाद देगा। साधु गूढ से गूढ तत्व अपने आश्रित के पास खोल देगा।यह साधु प्रसाद है।।गुरु प्रसाद संदेह से बाहर निकाल देता है।मानस में किसी को लघु-किसी को छोटी शंका ,किसी को बडी शंका हूइ।कई लोगों की शंका अपूर्ण होती है कयीं को पूर्ण शंका होती है। साधु प्रसाद गंतव्य की प्राप्ति कर देता है।गुरु गोविंद दे देता है।समर्थ गुरु चारों वेद देता है।
अयोध्या कांड का मंगलाचरण शिव जी की वंदना के बाद भगवान की समान चितवृति का वर्णन किया फिर करूण वनवास प्रसंग,चित्रकूट का मिलन का प्रसंग बहेती आंखो से गाया।
अरण्यय कांड में अत्रि स्तुति का गायन करते हुए कुंभज से मिलकर गोदावरी तट पर पंचवटी में राम ने निवास किया। सूर्पनखा को दंडित करने के बाद जब सीता हरण हुआ तो ललित नर लीला और किष्किंधा कांड में खोज करते-करते शबरी के आश्रम में आए। नवधा भक्ति के गान के बाद शबरी को गति दी और हनुमान जी से मैत्री,वाली का निर्वाण,अंगद को युवराज बनाया और चातुर्मास के बाद सुंदरकांड में हनुमान जी का सीता खोज और हनुमान जी का लंका गमन,लंका दहन के बाद वापस आना ये सब संक्षिप्त रुप से प्रसंग उठाये। लंका कांड में आरंभ में समुद्र के किनारे सेतुबंध का स्थापन हुआ और राम अपनी पूरी सेना लेकर लंका पर आए। फिर संधि का प्रस्ताव विफल हुआ। युद्ध अनिवार्य हुआ। आपको बता दें कि कल इस रामकथा का विराम का दिन है।
