वीर शिरोमणि भड़ माधोसिंह भण्डारी एक अमर कथा

–वीरेन्द्रसिंह भण्डारी–

हिमालय की ऊँची-नीची पर्वत-शृंखलाओं के मध्य, जहाँ शिलाएँ मौन तपस्या करती हैं और नदियाँ युगों की स्मृति बहाती हैं, वहीं केदारखंड की पावन गढ़भूमि स्थित है। यह भूमि केवल देवताओं की नहीं रही, यह वीरों की भी रही है—ऐसे वीर, जिनका जीवन तलवार से अधिक कर्तव्य से और युद्ध से अधिक जनकल्याण से आलोकित रहा। इसी गढ़भूमि ने एक ऐसे युगपुरुष को जन्म दिया, जिसे इतिहास वीर शिरोमणि भड़ माधोसिंह भण्डारी के नाम से जानता है।
यह कथा आरम्भ होती है काली कुमाऊँ से। माना जाता है कि भण्डारी वंश के पूर्वज चम्पावत की काली कुमाऊँ से गढ़वाल की ओर आए थे। कत्यूर वंश के शासनकाल में परमार क्षत्रियों को राज्य की युद्ध-नीति के साथ-साथ अन्न, रसद और धन-भण्डारण की व्यवस्था का दायित्व सौंपा गया था। इन्हीं उत्तरदायित्वों के कारण परमार योद्धा जनमानस में “भण्डारी” कहलाए। कालांतर में यही वंश लस्या पट्टी के लखनापुर–लालुड़ी ग्राम में आकर स्थिर हुआ।
इसी वंश में जन्मे भड़ राय रावसिंह भण्डारी, जो आगे चलकर काला भण्डारी के नाम से विख्यात हुए। काली कुमाऊँ से आए होने के कारण “काला” विशेषण उनके नाम से जुड़ा और शीघ्र ही यह नाम वीरता, स्वाभिमान और विजय का पर्याय बन गया। काला भण्डारी केवल पराक्रमी योद्धा ही नहीं थे, बल्कि एक समृद्ध, जनप्रिय और गौरवमय व्यक्तित्व के स्वामी थे।