वीर शिरोमणि भड़ माधोसिंह भण्डारी
(वीरता, प्रेम और जनकल्याण का महाकाव्य)
मंगलाचरण
नमन हिमालय शिरोभूषण, नमन गढ़भूमि मातृ,
जहाँ शिला भी व्रत धरती है, जल गाता इतिहास।
नमन तिरलोकी नारायण, नागस्वरूप महान,
माँ बाला सुंदरी के चरणों में, अर्पित यह गान।
गुरुमाणिक नाथ कृपा करें,
कविता को दें प्राण,
गढ़भूमि के उस सपूत का
उद्घोष करूँ सम्मान।
प्रथम सर्ग काला भण्डारी कुलदीप का,
काली कुमाऊँ की धरा से
उठी पराक्रम की ज्वाला,
लालुड़ी में आ स्थिर हुई
भण्डारी कुल की माला।
परमार वंश की तेजस्विता,
कत्यूर काल की शान,
भण्डारों का भार उठाया,
बना भण्डारी पहचान।
राय रावसिंह रणधीर थे,
कहलाए काला वीर,
सौंण बाण की उपाधि पाई,
विजय हुआ गम्भीर।
गढ़देश ही नहीं, सीमांतों तक
उनका यश फैल गया,
जहाँ नाम लिया काला भण्डारी का,
वहाँ शत्रु थर्रा गया।
द्वितीय सर्ग : वीरों की पाठशाला
लालुड़ी की पथरीली गोद
कोई साधारण आँगन न थी,
वह वीर-निर्माण की वेदी थी,
जहाँ इतिहास की ज्वाला जली।
बालक माधोसिंह, भावसिंह,
शायदसिंह—तीन प्रकाश,
खेल नहीं, तपस्या थी उनकी,
शस्त्र बने विश्वास।
धनुष-बाण से दृष्टि सधी,
कुश्ती से बल का बोध,
मल-युद्ध ने धैर्य सिखाया,
तलवार ने दिया विरोध।
भाला, ढाल, अश्व-दौड़,
पर्वतों पर कठिन प्रहार,
ऊँची शिलाओं से निर्भीक छलाँग—
डर को मिला संहार।
काला भण्डारी कहते थे—
“वीर वही जो स्थिर रहे,
विपदा में भी विवेक धरे,
और धर्म-पथ पर अडिग रहे।”
तृतीय सर्ग : माता उत्तरा की परीक्षा
एक दिवस शेरणी माता ने
पुत्र की ली परख,
अस्वस्थ कह कर बोलीं—
“बेटा, सुन मेरी चाह एक।”
“घराट की बीट का सत्तू
मन भीतर ललचाए,
पर इस शुष्क भूभाग में
जल कहाँ से आए?”
माधोसिंह ने शीश झुकाया,
कहा—“माँ, आज्ञा अमोघ,
माता का वचन ही मेरे लिए
ईश्वर का प्रत्यक्ष बोध।”
भावसिंह, शायदसिंह संग चले,
साथ ग्राम के वीर,
हिलौंऊ की गाड़ से निकाली
जीवन-धारा गंभीर।
एक दिवस, एक रात्रि में
बह चली कूल महान,
घराट घूमा, सत्तू पिसा,
माता हुई प्रसन्न।
यह केवल पुत्र-भक्ति न थी,
यह जनकल्याण का बीज,
यहीं से जन्मा कर्मयोग,
यहीं से उठा ताज।
चतुर्थ सर्ग : कृषि और लोककल्याण
पशुधन की रक्षा करी,
कृषि को दी पहचान,
पर्वतीय ढलानों को काटकर
रचे सीढ़ीनुमा खेत महान।
जल का संचय, भूमि का संरक्षण,
रुका विनाश का वेग,
कुदाल बनी तलवार यहाँ,
श्रम बना रण-योग।
गढ़भूमि ने गर्व से कहा—
“यह वीर केवल रण का नहीं,
यह जीवन रचने वाला है।”
पंचम सर्ग : उत्तर सीमांत का सिंह
हटती घाटी पार कर
दापा दुर्ग पर धावा,
ढालू मैदान तिब्बत के
देख काँपे शत्रु-भावा।
सतलज तक खिंची सीमा-रेखा,
गढ़राज्य का मान,
माधोसिंह की तलवार बनी
उत्तर की पहचान।
महिपति शाह ने कहा सभा में—
“यह भड़ नहीं, शिरोमणि है,
गढ़भूमि का उज्ज्वल स्तम्भ,
रण और नीति का मणि है।”
मलेथा का समूचा क्षेत्र,
पिलखी, जाखी गढ़,
जागीर बनी सम्मान की,
वीरता का पड़।
षष्ठ सर्ग : प्रेम की अमर कथा
गडौल्य गढ़ की उदीना,
रूप और साहस की खान,
प्रेम किया रणबाँकुरे से,
भूली लोक-अपमान।
युद्ध-प्रस्थान से पूर्व कहा—
“विजय के पश्चात आऊँगा,”
तीन मास बीते रण में,
प्रेम परीक्षा पाऊँगा।
पाँच फेरे पूर्ण हुए थे,
गाईका संग नारी,
तभी पहुँचे रण-विजयी
माधोसिंह भण्डारी।
मल-युद्ध हुआ धर्मानुसार,
सत्य हुआ विजयी,
उदीना बनी अर्धांगिनी,
प्रेम हुआ स्थायी।
सप्तम सर्ग : संघर्ष और बलिदान
रूकमा की पीड़ा, उदीना का क्लेश,
माता उत्तरा का धर्मादेश,
मलेथा पहुँची उदीना,
जीवन हुआ संघर्षमय विशेष।
वीरसिंह का जन्म हुआ
विजय के शुभ क्षण में,
नाम में ही अंकित थी
बलि की कथा मन में।
छैंणा बनी, कूल बही,
धरती ने माँगा दान,
वीरसिंह ने शीश चढ़ाया,
अमर हुआ बलिदान।
अष्टम सर्ग : वीरगति और अमरता
सीमांत से लौटते समय
कैरखाल की धार,
वीरगति को प्राप्त हुए
गढ़भूमि के आधार।
पर मरे नहीं माधोसिंह,
वे गाथा बनकर जिए,
पंवाड़ों में, जनमन में
युग-युग अमर हुए।
आज भी पर्वत गूँज उठते—
“एक सिंह रण-बण, एक सिंह गाईका।
एक सिंह माधोसिंह, और सिंह काहैका॥”
उपसंहार
तलवार से सीमाएँ रचीं,
कुदाल से जीवन सँवारा,
प्रेम से धर्म निभाया,
बलिदान से यश निखारा।
न भूतो, न भविष्ये,
ऐसा वीर महान,
गढ़भूमि की आत्मा है
वीर शिरोमणि भड़ माधोसिंह भण्डारी महान।
काव्य लेख- वीरेन्द्रसिंह भण्डारी
ग्राम सरूणा ग्यारह गाँव हिन्दाऊ घनसाली भिलंगना टिहरी गढ़वाल (उत्तराखण्ड)
![]()
