साधारण नहीं था वीर भड़ माधोसिंह भण्डारी का बाल्यकाल 

देहरादून, वीरेन्द्र सिंह भण्डारी। वीर भड़ माधोसिंह भण्डारी का बाल्यकाल साधारण नहीं था। पिता से उन्होंने शस्त्रविद्या, अनुशासन और स्वाभिमान सीखा, तो माता से श्रम, करुणा और जनसेवा का संस्कार। किंतु माधोसिंह अकेले नहीं थे। उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर बढ़ने वाले दो छोटे भाई भी थे—भावसिंह भण्डारी और शायदसिंह भण्डारी। तीनों भाइयों का पालन-पोषण एक ही संस्कार में हुआ। जहाँ माधोसिंह स्वभाव से गंभीर,बलशाली विलक्षण बुद्धि तथा नेतृत्वशील और दूरदर्शी थे, वहीं भावसिंह साहसी, वाकपटु और रणभूमि में निर्भीक योद्धा के रूप में उभरते थे। सबसे छोटे शायदसिंह तीव्र बुद्धि, चपलता और अद्भुत निष्ठा के लिए जाने जाते थे। वे प्रायः अपने बड़े भाई की छाया बनकर चलते थे।
गढ़देश के लोग कहते थे—”भण्डारी घर में केवल तीन भाई नहीं, तीन धाराएँ बहती हैं—एक नेतृत्व की, दूसरी शौर्य की और तीसरी निष्ठा की।” एक माँ की इच्छा और असंभव का संकल्प, माता उत्तरा की एक साधारण-सी इच्छा—अपने घराट में पिसे अन्न का शतू खाने की—माधोसिंह के जीवन की दिशा बदल देती है। लालुड़ी की सूखी, पथरीली भूमि में जल लाना असंभव माना जाता था, पर माधोसिंह ने असंभव को ही अपना लक्ष्य बनाया। एक दिन-एक रात की अमर गाथा केवल एक दिन और एक रात में, हिलौंऊ की गाड़ से लालुड़ी तक लगभग आठ किलोमीटर लंबी नहर (कूल) का निर्माण हुआ। चट्टानें कटीं, पहाड़ झुके और जल बह निकला। यह केवल जलधारा नहीं थी, यह गढ़भूमि के भविष्य की रेखा थी। चम्पा मान हुड़क्या और राजदरबार इस अद्भुत कर्म की गूँज चम्पा मान हुड़क्या के हुड़के से निकलकर श्रीनगर के राजदरबार तक पहुँची। महाराजा महिपति शाह ने पहली बार माधोसिंह के नाम को गंभीरता से सुना—और भविष्य को पहचान लिया।
और राजाज्ञा
दापा घाटी पर शत्रु आक्रमण ने गढ़राज्य को झकझोर दिया। अनेक वीर सैनिक रणभूमि में गिर पड़े। सेना पति वीर भड़ रिखोला लौदी अपने सेना नायक सुबेदार भीमसिंह बर्तवाल के साथ दुश्मनों के साथ लड़ते-लड़ते घायल हो चुके थे। संकट की इस घड़ी में महाराजा महिपति शाह ने समूचे गढ़देश के नौजवानों को मातृभूमि की रक्षा के लिए पुकारा।
चम्पा मान हुड़क्या द्वारा इस
आवाहन को सुनकर भण्डारी परिवार में भी निर्णय का क्षण आया। माधोसिंह भण्डारी ने अपने गाँव के संघी साथियों के संग बिना किसी द्वंद्व के शस्त्र धारण किए। उनके साथ भावसिंह और शायदसिंह भी खड़े हो गए। तीनों भाइयों ने और संघी साथियों ने एक साथ सबने माता उत्तरा के चरण स्पर्श किए। उत्तरा ने कांपते हाथों से सभी के मस्तक पर यह कहकर आशीर्वाद दिया—”गढ़भूमि की रक्षा करना, यही तुम्हारा धर्म है।” उस दिन लखनापुर–लालुड़ी से केवल एक नहीं, कही काला भण्डारीयों की सिंह टोली श्रीनगर की ओर चल पड़ें हैं।

 

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