–देवेंद्र कुमार बुडाकोटी एवं स्वागता सिन्हा रॉय–
मलेशिया में तमिल हिंदू प्रवासी समुदाय हर वर्ष थाइपूसम पर्व उन प्रमुख नगरों में मनाता है जहाँ भगवान मुरुगन को समर्पित मंदिर स्थित हैं। सबसे भव्य आयोजन कुआलालंपुर के बाटू गुफाओं (Batu Caves) में होता है, जहाँ हर वर्ष लाखों श्रद्धालु और पर्यटक एकत्र होते हैं। समय के साथ बाटू गुफाओं का मंदिर परिसर न केवल एक प्रमुख धार्मिक केंद्र बना है, बल्कि मलेशिया की एक महत्वपूर्ण धरोहर स्थल के रूप में भी विकसित हुआ है

बाटू गुफाएँ भारत के बाहर सबसे महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थ स्थलों में से एक हैं और थाइपूसम उत्सव का केंद्र बिंदु हैं। भारत में यह पर्व विशेष रूप से तमिलनाडु के पलानी स्थित अरुलमिगु धंडायुथापानी स्वामी मंदिर में मनाया जाता है। भगवान मुरुगन, जिन्हें कार्तिकेय या सुब्रमण्यम भी कहा जाता है, साहस, बुद्धि और बुराई पर विजय के देवता माने जाते हैं
थाइपूसम उस दिव्य क्षण की स्मृति में मनाया जाता है जब देवी पार्वती ने भगवान मुरुगन को असुर सूरपद्मन का वध करने के लिए भाला (वेल) प्रदान किया था। श्रद्धालु कावड़ियाँ उठाकर तपस्या और भक्ति का प्रदर्शन करते हैं—ये सजी हुई संरचनाएँ आध्यात्मिक भार और आस्था का प्रतीक होती हैं। कई भक्त शरीर में हुक, कील और त्रिशूल चुभोकर भी भक्ति प्रकट करते हैं, जो त्याग और आत्मशुद्धि का प्रतीक माना जाता है
कावड़ियाँ आकार और सजावट में भिन्न–भिन्न होती हैं—कुछ साधारण लकड़ी के ढाँचे होते हैं तो कुछ फूलों, मोरपंखों और भगवान मुरुगन की छवियों से सुसज्जित भव्य संरचनाएँ। कुछ श्रद्धालु दूध से भरे पीतल या मिट्टी के घड़े भी चढ़ावे के रूप में उठाते हैं। भव्य शोभायात्रा सुबह–सवेरे कुआलालंपुर के श्री महामरियम्मन मंदिर से प्रारंभ होकर लगभग 14 किलोमीटर की यात्रा तय कर बाटू गुफाओं तक पहुँचती है। पहले यह रथ बैलों द्वारा खींचा जाता था, लेकिन 1983 से 21 फुट लंबा चाँदी का रथ वाहन द्वारा खींचा जा रहा है
ऐतिहासिक रूप से, बाटू गुफाएँ 1878 में प्रसिद्ध हुईं जब भारतीय व्यापारी के. थम्बूसामी पिल्लै ने इसे उपासना स्थल के रूप में विकसित किया। गुफा के वेल–आकार के प्रवेश द्वार से प्रेरित होकर उन्होंने यहाँ भगवान मुरुगन को समर्पित मंदिर की स्थापना की। 1891 से तमिल महीने ‘थाई’ में—जो जनवरी के अंत या फरवरी की शुरुआत में पड़ता है—यहाँ थाइपूसम हर वर्ष मनाया जा रहा है। 2026 में यह पर्व 1 फरवरी को पड़ता है
मंदिर तक पहुँचने के लिए मूल लकड़ी की सीढ़ियाँ 1920 में बनाई गई थीं, जिन्हें बाद में 1940 में 272 कंक्रीट सीढ़ियों से बदल दिया गया। मंदिर परिसर में तीन मुख्य गुफाएँ और कई छोटी गुफाएँ हैं। मुख्य गुफा में ऊँची गुंबदनुमा छत और सुसज्जित देवालय हैं। पहाड़ी के नीचे आर्ट गैलरी गुफा और संग्रहालय गुफा स्थित हैं, जिनमें हिंदू मूर्तियाँ और चित्र प्रदर्शित हैं। 2008 में नवीनीकरण के बाद इस क्षेत्र को ‘केव विला’ कहा जाने लगा। मुख्य परिसर के बाईं ओर स्थित रामायण गुफा में महाकाव्य के दृश्य प्रदर्शित हैं और वहाँ भगवान हनुमान की विशाल प्रतिमा भी स्थापित है
यहाँ का एक प्रमुख आकर्षण 42.7 मीटर (140 फुट) ऊँची भगवान मुरुगन की प्रतिमा है। यह मलेशिया की सबसे ऊँची मुरुगन प्रतिमा और विश्व की दूसरी सबसे ऊँची प्रतिमा है, जिसका उद्घाटन जनवरी 2006 में हुआ था
आज थाइपूसम एक प्रमुख तीर्थ और सांस्कृतिक आयोजन बन चुका है, जिसमें विश्वभर से हिंदू श्रद्धालु भाग लेते हैं। यह एक महत्वपूर्ण पर्यटन आकर्षण भी है और मलेशिया के कई राज्यों में सार्वजनिक अवकाश के रूप में मनाया जाता है। तीन दिनों तक चलने वाला यह पर्व मलेशिया की धार्मिक सौहार्द्रता को दर्शाता है, जहाँ विभिन्न आस्थाओं के लोग भक्ति और उत्सव की भावना में सहभागी होते हैं
