-एक पहाड़ी शिल्प, एक आजीविका, एक आत्मनिर्भर भविष्य
चमोली। चमोली जिले के नीति-माणा क्षेत्र की महिलाएं और चरवाहा समुदाय पीढ़ियों से ऊन बुनने का काम करते आए हैं। मोटी पंखी, लोई, थुलमा और चुटका जैसे ऊनी वस्त्र कभी इस इलाके की पहचान थे। इन्हें स्थानीय पालसी भेड़ों की स्वदेशी ऊन से बुना जाता था। यही ऊन हिमालय की ठंड से बचाव करती थी और यही लोगों की आजीविका भी थी। लेकिन समय के साथ बाज़ार ने सब कुछ बदल दिया। अब इन गांवों में साल में कई बार ऐक्रेलिक धागों से भरे ट्रक आते हैं। ये सस्ते, चमकदार धागे पहाड़ की महिलाओं को लुभाते हैं क्योंकि इनसे टोपियाँ, मोज़े और स्वेटर जल्दी बनाए जा सकते हैं। बद्रीनाथ जैसे तीर्थस्थलों में ये सामान खूब बिकते हैं। महिलाएं इन्हें 100, 200 रुपये में बेच देती हैं और उन्हें लगता है कि वे अच्छी कमाई कर रही हैं। जबकि वस्तुस्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है-असल में व्यापारी कमा रहे हैं। महिलाओं की मेहनत सस्ती कच्ची सामग्री और कम दाम में फँसकर रह जाती है। पारंपरिक ऊन, मौलिक बुनाई और असली पहचान धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है।
उत्तराखण्ड में लूम्स ऑफ नीति-माणा का उद्देश्य बहुत सरल हैः महिलाओं को मजदूर नहीं, मालिक बनाना है।
1. पारंपरिक ऊन शिल्प को पुनर्जीवित करना, पालसी भेड़ों की स्वदेशी ऊन से बने असली हिमालयी वस्त्रों को वापस बाज़ार में लाना। 2. भांग और ऊन आधारित नए उत्पाद विकसित करना ताकि पहाड़ की सामग्री से प्रीमियम और टिकाऊ उत्पाद बन सकें।
3. गांवों में उत्पादक सहकारी संस्थाएं बनाना ताकि महिलाएं और कारीगर मिलकर तय करेंगें, क्या बनेगा, कैसे बनेगा और किस दाम पर बिकेगा।
लूम्स ऑफ लद्दाख की संस्थापक अभिलाषा बहुगुणा ने बताया कि हमने यह प्रयोग लद्दाख में किया, वहां की महिलाओं के द्वारा स्थानीय ऊन का प्रयोग करके तथा बाजार की मांग को देखते हुए नये डिजाइन के उत्पाद तैयार किये जा रहे हैं। इससे स्थानीय महिलाओं में बडा उत्साह देखने को मिला और महिलाओं द्वारा यह कार्यक्रम सफलता पूर्वक किया जा रहा है और इससे स्थानीय महिलाओं की आय में कई गुना बृद्धि दर्ज की गई है। इसीलिए यह कार्यक्रम हम नीति-माणा में भी कर रहे हैं जिससे यहां की महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाया जा सके।
दिल्ली प्रदर्शनीः एक ऐतिहासिक मोड़-जब नीति-माणा सहकारी के सदस्य दिल्ली की प्रदर्शनी में जाने लगे, तो वे दुविधा में थे कि क्या सस्ते ऐक्रेलिक उत्पाद ले जाएं या अपनी स्वदेशी ऊन से बने महंगे, असली उत्पाद? उन्हें डर था कि शहर के ग्राहक सिर्फ सस्ता चाहते हैं। लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उलट। दिल्ली में उनके स्वदेशी ऊन उत्पाद प्रीमियम कीमतों पर बिके। लोगों ने गुणवत्ता, कहानी और हिमालयी विरासत को पहचाना। यह सिर्फ सामान्य विक्रय नहीं था, यह आत्मविश्वास की वापसी थी।
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) चमोली के जिला विकास प्रवन्धक श्रेयांश जोशी ने बताया कि महिलाओं और कारीगरों को स्थानीय उत्पाद से बाज़ार की माँग के अनुसार हस्तकरघा के उत्तम क्वालिटी के नयी नयी डिजाइन के उत्पाद बनेंगे तो निश्चित तौर पर स्थानीय महिलाओं की आजीविका में सुधार आयेगा उन्होंने बताया कि स्थानीय लोगों को आत्मनिर्भर बनाने में नाबार्ड सदैव सहयोग करता रहता है।
नीति-माणा सहकारी समिति को लूम्स ऑफ लद्दाख महिला टीम की संस्थापक अभिलाषा बहुगुणा, मानव सेवा समिति के महेश खँकरियाल और नीति-माणा सहकारी समिति के निर्वाचित सदस्य कुंदन सिंह टकोला, नंदी राणा, किशोर बडवाल और नरेंद्र राणा मिलकर इस पूरी व्यवस्था को खड़ा कर रहे हैं। यहाँ सिर्फ बुनाई नहीं, भविष्य को बुना जा रहा है। नीति-माणा सहकारी समिति का मतलब है महिलाएं अब केवल धागा नहीं, वे अपना भविष्य बुनेंगी। जहां पहले वे सस्ते धागों में फँसी थीं, अब वे अपनी ऊन, अपने हाथ और अपनी पहचान की मालिक ख़ुद बनेंगी। यह चमोली के पहाड़ों से एक आत्मनिर्भर, सम्मानजनक और टिकाऊ आजीविका की शुरुआत है।
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