युवा पीढ़ी ऐसे दर्शन की ओर आकर्षित हो रही है जहां उन्हें इसके दीर्घकालिक परिणामों का पता नहीं है। एक रिश्ते से दूसरे रिश्ते में कूदना किसी भी तरह से संतोषजनक जीवन नहीं है। विवाह संस्था व्यक्ति के जीवन को जो सुरक्षा और स्थिरता प्रदान करती है, वह लिव-इन-रिलेशनशिप में अपेक्षित नहीं है। लिव इन समर्थकों को सोशल साइंस रिसर्च में प्रकाशित शोध ‘कोहैबिटेशन डिसोल्यूशन एंड साइकोलाजिकल डिस्ट्रेस अमंग यंग अडल्ट्स’ शोध पढ़ना चाहिए। इस शोध के अनुसार लिव-इन संबंध टूटने के बाद अवसाद, मानसिक तनाव और भावनात्मक अस्थिरता बढ़ती है। लिव-इन संबंध का टूटना एक गंभीर तनावपूर्ण जीवन-घटना है, जिसके दूरगामी और घातक मनोवैज्ञानिक परिणाम हो सकते हैं।
हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप के चलन पर चिंता जताते हुए कहा कि ऐसे रिश्तों में महिलाओं को पत्नी का दर्जा देकर सुरक्षा दी जाए। कोर्ट ने यह भी कहा, ‘लिव-इन रिलेशन भारतीय समाज के लिए एक सांस्कृतिक झटका है, लेकिन ये बड़े पैमाने पर हो रहे हैं। लड़कियां सोचती हैं कि वे माडर्न हैं और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का फैसला करती हैं, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें आभास होता है कि यह रिश्ता शादी की तरह कोई सुरक्षा नहीं दे रहा है।’ तमाम अदालतें निरंतर इसके लिए चेता रही हैं कि लिव इन रिलेशनशिप अपेक्षाकृत लड़कियों के लिए सामाजिक स्तर पर कहीं अधिक नुकसानदायक है, लेकिन शायद युवाओं के लिए आधुनिक होने का तात्पर्य पश्चिमी संस्कृति को अपनाना हो गया है। उनकी यह सोच उन्हें ऐसी स्थितियों में धकेल देता है, जहां से निकलने का हर प्रयास नाकाम हो जाता है। अगर ऐसा नहीं होता तो लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाला कोई भी युगल न्यायालय के दरवाजे खटखटाता हुआ नहीं दिखाई देता। अगस्त 2023 में ‘अदनान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य’ मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की टिप्पणी थी कि अधिकांश लिव-इन जोड़ों के बीच ब्रेकअप हो जाता है और उसके बाद महिला के लिए समाज का सामना करना मुश्किल हो जाता है। एक तरह के सामाजिक बहिष्कार से लेकर अभद्र सार्वजनिक टिप्पणियां लिव-इन रिलेशनशिप के बाद उसके कष्टों का हिस्सा बन जाती हैं। जिस पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण कर युवा पीढ़ी लिव इन रिलेशनशिप अपना रही है, उसे यह जानना होगा कि आज भी पुरुषों और स्त्रियों के लिए स्पष्ट रूप से अलग नैतिक नियम हैं और इसका उदाहरण ब्रिएना पेरेली-हैरिस का शोध है, जो यूरोप के 11 देशों पर आधारित है।
इसमें पाया गया कि लिव-इन में रहने वाली महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक नकारात्मक दृष्टि, चरित्रगत संदेह और सामाजिक आलोचना का सामना करना पड़ता है। शोध यह भी बताता है कि जहां पारंपरिक पारिवारिक और नैतिक मूल्य अधिक मजबूत हैं, वहां लिव-इन के बाद महिलाओं के लिए नए संबंधों में स्थापित होना, सामाजिक स्वीकृति पाना और सम्मानजनक जीवन में पुनः प्रवेश करना कहीं अधिक कठिन हो जाता है। इसी असमान और कठोर सामाजिक व्यवहार को शोधकर्ताओं ने स्पष्ट रूप से ‘जेंडर्ड स्टिग्मा’ कहा है। यह शोध यह स्थापित करता है कि लिव-इन संबंध महिलाओं के लिए केवल व्यक्तिगत विकल्प नहीं रह जाता, बल्कि एक ऐसा सामाजिक जोखिम बन जाता है, जिसके दीर्घकालिक मानसिक, सामाजिक और भविष्यगत दुष्परिणाम होते हैं।
तमाम अध्ययन इस तथ्य को स्थापित कर रहे हैं कि ‘लिव इन रिलेशनशिप’ कभी भी वैवाहिक संस्था का विकल्प नहीं हो सकता। मनोविज्ञानी स्काट एम स्टैनली अपने ‘स्लाइडिंग बनाम डिसाइडिंग सिद्धांत’ में स्पष्ट करते हैं कि लिव-इन संबंधों में युवा अक्सर सोच-समझकर निर्णय नहीं लेते, बल्कि परिस्थितियों के साथ धीरे-धीरे फिसलते हुए बड़े जीवन-निर्णयों में प्रवेश कर जाते हैं। इन रिश्तों में स्पष्ट और सचेत प्रतिबद्धता नहीं होती। यही असंतुलन आगे चलकर भावनात्मक असुरक्षा, मानसिक तनाव और संबंधों की अस्थिरता का कारण बनता है। स्टैनली का शोध कहता है कि लिव-इन संबंध टूटने पर अवसाद, आत्मसम्मान में गिरावट और भविष्य के रिश्तों पर नकारात्मक प्रभाव छोड़ते हैं। लिव-इन संबंध आकर्षक लग सकते हैं, पर वास्तव में वे उच्च-जोखिम वाले हैं, जिनके प्रायः नकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। यह देश में विवाह संस्था को नष्ट करने और समाज को अस्थिर करने और प्रगति में बाधा डालने की व्यवस्थित योजना है। फिल्मों और टीवी धारावाहिकों के प्रसारण से विवाह संस्था का खात्मा हो रहा है। विवाहित रिश्तों में साथी के साथ बेवफाई और स्वतंत्र लिव-इन-रिलेशनशिप को प्रगतिशील समाज की निशानी बताया जा रहा है।
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