हमारे गणतंत्र के छिहत्तर वर्षो में

— हेमचंद्र सकलानी–
देश को और हमें अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त हुए 79 वर्ष व्यतीत हो गए और कुछ वर्ष पूर्व “आजादी का अमृत महोत्सव” पूरे देश में खूब जोर शोर से मनाया गया ।  देश अपने गणतंत्र के 77वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इतने वर्षों में देश ने बहुत से उतार चढ़ाव देखे। एक समय विश्व के सारे देशों पर राजाओं का क्रूर शासन था धीरे धीरे अन्याय अत्याचार के विरुद्ध जनआक्रोश के फलस्वरूप अनेक देश स्वतंत्र हुए.
स्वतंत्रता का अर्थ है प्रतिबंधों से मुक्त होना अर्थात कैद गुलामी से मुक्त हो अपनी उन्नति समृद्धि l विकास की ओर अग्रसर होना. गणतंत्र का सीधा सा अर्थ है गण अर्थात जनता का तंत्र (शासन),जनता के लिए, जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का अर्थात जनता का शासन. 1947 में आजादी तो मिल गई थी पर शासन ब्रिटिश अधिनियम के तहत ही चलता था. आज के दिन 26 जनवरी 1950 को अपना संविधान लागू हुआ और एक गणतंत्र देश के रूप में भारत का जन्म हुआ. संविधान ही स्वतंत्रता को सुंदरता गरिमा आदर्श उच्च संस्कृति प्रदान करता है, क्योंकि संविधान में हमारे सोच विचार क्रियाकलाप और भविष्य सब निर्धारित होते हैं जो हमें हमारी स्वतंत्रता को सुंदरता प्रदान करते हैं. इसके अभाव में स्वतंत्रता विकृत रूप धारण कर सकती है. अतः हमारी स्वतंत्रता को सुंदरता से नियंत्रित करने का तंत्र ही कहलाता है संविधान. इसलिए गणतंत्र दिवस पूरे देश में उत्साह के साथ मनाया जाता है.
आजादी के बाद की यह यात्रा सफलताओं के कीर्तिमान स्थापित करने की तो है ही,पर नेताओं तथा आम आदमी के चरित्र, नैतिकता, ईमानदारी, सिद्वांतों, आदर्शों से निचले स्तर तक गिरने की यात्रा भी कही जा सकती है। जहॉ जहॉ नागरिकों ने अपने उत्तरदायित्वों को अपना कर्तव्य समझ कर पूरा किया वहॉ देश ने सफलता के नये आयाम स्थापित किये। सारी दुनिया ने देश की उपलब्धियों को सराहा। जहॉ जहॉ लोग अपने कर्तव्यों से, उत्तरदायित्वों से विमुख रहे, सिर्फ अपने हक और अधिकारों के लिए लड़ते रहे और सारा दोष सरकार पर मढ़ कर इतिश्री करते रहे वहॉ सिर्फं असफलताएं, परेशानियां, अभाव, संकट हासिल होते रहे,पर गलतियों से न तो कुछ सीखने का,न ही उन्हें सुधारने का कभी प्रयास किया गया। लोग पूरी तरह भूल गये या यह कह सकते हैं कि सबने इसे पूरी तरह नक्कार दिया है कि कर्तव्य और अधिकार एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं, पर क्या एक के बिना दूसरे का कोई महत्व रह जाता है ?
सफलता के आयाम स्थापित करते हुए देश आज चॉद के निकट पहुंच गया है। जिन लोगों के पास साईकिलें नहीं थी उनके पास मोटर साईकिल है, कार हैं, जिनके पास झोपड़ी टूटा फूटा मकान तक नहीं था उनके पास आज कोठियॉ हैं,अच्छा खासा बिजनेस है,बैंक बैलेंस है पर फिर भी अभी भी डेढ़ अरब की आबादी में से बहुतों को आवास, रोजगार,जीवन जीने की सुविधा, सुरक्षा नहीं दे पाए।
बचपन मे एक कविता पढ़ी थी ”नॉट गोल्ड, बट ओनली मैन कैन मेक द नेशन ग्रेट एण्ड स्ट्रांग।” अर्थात धन, सम्पति से कोई देश महान नहीं हो जाता। देश को महान बनाते हैं उसके नागरिक। आज सबने व्यक्तिगत सम्पन्नता चाहे कैसे भी हासिल की हो, उसे ही अपने देश की उन्नति का, विकास का परिचायक मान बैठे हैं। कोई भी इसे स्वीकार नहीं करता की देश की समृद्वि, सम्पन्नता, उन्नति में ही हमारी समृद्वि, सम्पन्नता, उन्नति, निहित है। निजी स्वार्थों की, पूर्ति हर एक का अन्तिम लक्ष्य, अथवा उददेश्य मात्र रह गया है, इस क्रम मे देश बहुत पीछे छूट गया है। मात्र इसलिए कि देश के लोगों का प्रथम कार्य निजी स्वार्थों को पहले पूरा करना,दूसरा जाति व्यवस्था के हित में कार्य करना, तीसरा धर्म को जीवित रख सांप्रदायिक भावना को कायम कर लाभ उठाना, इसके बाद तब देश के प्रति कुछ सोचने करने का नंबर आता है।
आज शिक्षा संस्थानों में छात्रों का आचरण, छात्रसंघ चुनावों मे हुड़दंग, राजनीतिक पार्टियों का छात्रों को राजनीति मे घसीट कर अपने हित मे प्रयोग करना, एक भी ऐसा कार्यालय देश मे न हो जहॉ बिना रिश्वत दिये आम आदमी का काम हो जाये। कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि आज ईमानदारी से कार्य करने वाले प्रताड़ित किये जाते हैं और भ्रष्ट्राचारियों की पीठ थपथपायी जाती है। जीवन रक्षक दवाईयों में,खादय पदार्थों मे मिलावट आदि हमें कहीं से भी शर्मिदा नहीं करते। उल्टे सारा दोष सरकार पर जनप्रतिनिधियों पर मढ़ कर हम अपना उत्तरदायित्व निभा लेते हैं। जबकि जनप्रतिनिधी भी जनता चुनती है और सरकार भी जनता के मतों से ही बनती है। सच तो यह है कि इन सबके लिए कहीं न कहीं आम जन अर्थात जनता ही उत्तरदायी है कोई और नहीं। गत वर्ष में पुलवामा, शाहीन बाग, जैसे कांड देश देश को झेलने पड़े फिर पाकिस्तान चीन उसके बाद किसान आंदोलन,लखीमपुर में हुई घटना से देश में घबराहट का माहौल पैदा हुआ लेकिन आशा है मोदी जी के नेतृत्व में इन सब पर सफलता प्राप्त होगी।
इकबाल के प्रसिद्व गीत ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा’ को गर्व से देश में हर मिनट पर कहीं न कहीं गाया जाता है मगर उसी इकबाल ने हिन्दुस्तान छोड़ते वक्त पंक्तियां लिखीं थीं ”वतन की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है, तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में, वक्त रहते सम्भल जाओ ए हिंन्दुस्तान वालों वरना तुम्हारी दास्तां तक न होगी दास्तानों में।” यह इकबाल ने क्यों लिखा इस पर किसी ने विचार करने की जरुरत नहीं समझी। एक विदूशी महिला ने अपने एक वक्तव्य मे कहा-”मुझे हत्यारे से, चोर से लुटेरे से,भ्रष्ट्राचारी से,बलात्कारी से इतनी घृणा नही है जितनी मुझे घृणा उन लोगों से है जो यह सब सुनकर, देखकर खामोश बैठे रहते हैं इनका विरोध नहीं करते।” इसमें कोई संदेह नहीं कि लोग उन्नति, विकास की दौड़ में पश्चिम से होड़ लेते हुए अन्धाधुन्ध भाग रहे हैं। किसी ने भी जमीन की ओर देखने का प्रयास ही नहीं किया। यह देखने का प्रयास नहीं किया कि कितना नैतिक पतन, चारित्रिक पतन हो रहा है।समाज के सामाजिक मूल्यों,राजनैतिक मूल्यों,सांस्कृतिक मूल्यों में कितना हास हो रहा है। आज देश में सबसे बड़ा संकट भूख प्यास गरीबी निर्धनता का नहीं है, सबसे बड़ा संकट है चरित्र, नैतिकता, ईमानदारी, आचरण, सच्चाई,और अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाने का है। किसी ने सही कहा था ”इफ वैल्थ इज लॉस नथिंग इज लॉस, इफ हैल्थ इज लॉस समथिंग इज लॉस, इफ कैरेक्टर इज लॉस एवरी थिंग इज लॉस।” हर चीज को ऊपर उठने के लिए जमीन की, किसी धरातल की जरुरत होती है। हवाई जहाज को भी रुकने तथा उड़ने के लिए एक रनवे की जरुरत होती है, पेड़ पौधों को उगने, जीव जन्तुओं को रहने के लिए, विकसति होने के लिए एक जमीन की जरुरत होती है। मनुष्य के लिए यह जमीन, उसका कर्तव्य उसकी सभ्यता, उसकी संस्कृति, उसकी नैतिकता, उसका चरित्र, उसकी ईमानदारी तथा देश, समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को उसकी सही ढंग से निभाने वाली जिम्मेदारी होती है। इनके अभाव मे उन्नति, विकास, समृद्वि, रेत के महल की तरह सुंदर तो बहुत दिखाई देते हैं पर से पूरी तरह खोखले होते हैं।
लेकिन सत्ता लोलुपता की राजनीति ने और ”वाद” का ऐसा जहर समाज मे फैला दिया कि चाह कर भी क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद, धर्मवाद, माफियावाद, निजी स्वार्थवाद के रावण को हम मार नहीं पा रहे हैं। इसी का परिणाम है कि आतंकवाद, अराजकता, अव्यवस्था का रावण जब चाहे सर उठा कर अपार जन धन की हानि देश को पहुंचाने में सफल हो जाता है। आज देश में समाज में सारे वाद है जातिवाद, धर्मवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, नक्सलवाद, आतंकवाद, वर्गवाद, माफियावाद, राजनीतिवाद जैसे न जाने कितने वादों की चपेट में यह देश है अगर नहीं है कहीं, तो वह है राष्ट्रवाद। जब कि आज राष्ट्रवाद की भावना को भी हिन्दुत्व से जोड़ दिया गया है। जबकि राष्ट्रभावना ही अर्थात देश प्रेम की भावना ही वह तीर है, जिससे इन सभी वाद रूपी रावणों का वध किया जा सकता है। यह राष्ट्रवाद की भावना, न ही देने, न ही थोपने की चीज है। यह अंदर से स्वतः ही पैदा होने वाली चीज है, जिसे आज कुछ लोगों ने प्रदर्शन की, तो कुछ ने विरोध की वस्तु बनाकर रख दिया गया है।
अटल बिहारी बाजपेई जी ने कितना सही कहा भी है “भारत कोई जमीन का टुकड़ा नहीं एक जीता जागता राष्ट्र पुरुष है।” इसके प्रति बड़े सुंदर शब्दों में उन्होंने कहा “यह चन्दन की भूमि है यह अभिनन्दन की भूमि है, यह तर्पण की भूमि है यह अर्पण की भूमि है, इसका कंकर कंकर शंकर है, इसका बिंदु बिंदु गंगा जल है, हम जिएंगे तो इसके लिए हम मरेंगे तो इसके लिए।” अपनी देश भक्ति की भावना को उन्होंने इस तरह व्यक्त किया था “मातृ भूमि से बढ़कर कोई चंदन नहीं होता, वन्दे मातरम् से बढ़कर कोई वंदन नहीं होता।” इसी मातृ भूमि के लिए रामप्रसाद बिस्मिल ने अपनी शहादत से पूर्व लिखा था “खे लेने दो आज नाव मुझे फिर पतवार गहे न गहे,जीवन सरिता में फिर ऐसी रसधार बहे न बहे,अंतिम सांस निकलने तक है बिस्मिल की अभिलाषा यही, तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहे न रहें।”
आज देश के राष्ट्रीय पर्व केवल झंण्डा रोहण तक सीमित होकर रह गये हैं। वो भी संगीनों के साये में फहराने पड़ते हैं। इस पर कभी किसी ने सोचा, विचारा नहीं कि ये नए संकल्पों,आत्मवलोकन के दिवस होते हैं। ये राष्ट्र के प्रति गम्भीर चिन्तन, और मंथन के दिवस होते हैं न कि बड़बोलेपन के दिवस। संसद में समस्याओं पर मैराथन बेतुकी बहसें होती रहीं हैं। गत छिहत्तर वर्षों में,जिनका आज तक कोई हल नहीं निकला। हम कहॉ गलत रहे, कहॉ असफल रहे उन पर विचार करने का दिवस होता है गणतंत्र दिवस या स्वतन्त्रता दिवस, पर ऐसा कभी किया नहीं गया। दुष्यंत ने यह सब देख कर ही कहा था- ‘हो गयी पीर पर्वत सी, पिघलनी चाहिये, इस हिमालय से एक और गंगा निकलनी चाहिए’। लेकिन गंगा निकलती कैसे, जब इतिहास सिर्फ हंगामा खड़ा करने का रहा हो। आज जरुरत है इस व्यवस्था को बदलने के लिए एक नयी सोच की, एक नई विचार धारा की, एक नई कार्य प्रणाली की। जब तक हर व्यक्ति अपना आत्मावलोकन ईमानदारी से नहीं करेगा, जब तक अपनी कार्य प्रणाली मे परिवर्तन नहीे लायेगा, जब तक हर व्यक्ति दोषारोपण की प्रवृति को छोड़ेगा नहीं, तब तक कुछ बदलने वाला नहीं। वर्तमान में हर आदमी स्वार्थवाद से ग्रस्त है इस कारण वह सिर्फ अपना स्वार्थ, अपना हित,अपनी उन्नति, अपनी समृद्वि,अपना विकास देख रहा है। इसके लिए वह किसी भी सीमा तक गिरने को तैयार है। वह यह नहीं समझ रहा है कि उसकी उन्नति, समृद्वि में देश की उन्नति, समृद्वि निहित नहीं है, वरन देश की ही उन्नति, समृद्वि में उसकी और सारे समाज की उन्नति समृद्वि निहित है। इस गणतंत्र दिवस पर कम से कम सभी को अपनी भूल सुधार लेनी चाहिए और संकल्पों तथा आत्मवालोकन की प्रक्रिया प्रारम्भ कर देनी चाहिए। यह भी अच्छी तरह स्वीकार कर लेना चाहिये कि बिना अपने कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन किये, हमारे कोई और किसी प्रकार के अधिकार भी नहीं बनते हैं।
ऐसा नहीं कि सात दशकों में सब नकारात्मक ही हुआ हो। गत वर्षों में मोदी जी की सरकार ने ऐसे कार्य किए जिनकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। कश्मीर में इतनी आतंकवादी घटनाओं पत्थर बाजी, घटनाओं को रोकना ही नहीं, धारा तीन सौ सत्तर की समाप्ति, सामान नागरिकता कानून लाना, तीन तलाक पर कानून बनाना, एक टैक्स एक राष्ट्र का फार्मूला की सोच को अमल में लाना, पांच शताब्दी बाद राम मन्दिर का निर्माण करना ऐसे अनेक कार्य रहे जिनसे विश्व में देश की गरिमा बड़ी। यही नहीं कोरोना के कारण जब सारा विश्व संकट में था तब देश में लाखों लोगों का रोजगार छिन जाना, उद्योग धंधों पर व्यापक संकट छाना, ऐसी संकट कालीन परिस्थितियों में बिना काम के घर घर राशन उपलब्ध करना कि कोई भूखा न मर सके जैसे कार्य किए। जिनसे सारा विश्व चकित हुआ यही नहीं सेना को शक्तिशाली बनाने के अनूठे प्रयास किए। सबसे विशेष बात मोदी जी, योगी जी में देखने को मिली वो ये थी कि माफिया दलाल अपराधी भ्रष्ट्राचारियों को अपने निकट नहीं फटकने दिया। यहां तक कि इनके रिश्तेदार भी उनके निकट खड़े देखने को नहीं मिलते। जबकि अन्य दलों के नेताओं का पूरा कुनबा साथ चलता नज़र आता है। आज देश को ऐसे ही नेताओं,अधिकारियों, कर्मचारियों की और जनता की जरूरत है। आज हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों उत्तरदायुत्वों को ईमानदारी से और समय से पूरा करने की शपथ लेनी चाहिए, तभी गणतंत्र दिवस सार्थक हो पाएगा।
अच्छी तरह समझ लेना चाहिए गणतंत्र की असफलता सरकार शासन की असफलता नही जनता की असफलता है क्योंकि यह जनता का तंत्र है जनता द्वारा चुने प्रतिनिधियों का तंत्र है इसकी सफलता तभी है जब हम अच्छे जनप्रतिनिधि चुने।