किसी भी अर्थव्यवस्था में विकास दर तभी सार्थक होगी, जब रोजगार के नये मौके उपलब्ध हो रहे हों। नीति-नियंताओं को आत्ममंथन करना होगा कि दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था में रोजगार के नये अवसर क्यों नहीं बन रहे हैं। बेरोजगारी की बढ़ती दर चिंता बढ़ाने वाली है। केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट में गत दिसंबर में बेरोजगारी दर बढ़कर 4.8 फीसदी होने की बात कही गई है। भारत दुनिया में युवाओं के देश के रूप में जाना जाता है। लेकिन हम इस युवा शक्ति का भरपूर उपयोग राष्ट्र विकास में नहीं कर पा रहे हैं। चिंता की बात यह भी है कि देश के शहरी क्षेत्र में पंद्रह वर्ष से अधिक आयु वर्ग के युवाओं में बेरोजगारी की दर गांवों के मुकाबले ज्यादा है। जहां शहरों में यह प्रतिशत बढ़कर 6.7 फीसदी हुआ है, वहीं ग्रामीण क्षेत्र में यह 3.9 फीसदी स्थिर है। हाल ही के वर्षों में बेरोजगारी देश में बड़ा मुद्दा रहा है, जो भारत जैसे विकासशील देश के हित में नहीं है। सरकारें सुनिश्चित करें कि युवाओं को देश की तरक्की में योगदान देने का अवसर मिले। यदि बेरोजगारी की दर बढ़ रही है तो इसके मायने हैं कि संगठित और असंगठित क्षेत्र में नौकरी के मौके बढ़ नहीं रहे हैं। कहा जा रहा है कि औद्योगिक क्षेत्रों में एआई और डिजिटलीकरण के चलते भी नौकरियां घटी हैं। तो क्या हम इस चुनौती के लिये अपने युवाओं को तैयार कर रहे हैं?
नीति-नियंताओं को मंथन करना चाहिए कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘स्किल इंडिया’ जैसे अभियानों के जमीनी परिणाम उत्साहवर्धक क्यों नहीं हैं? युवाओं की कौशल विकास कार्यक्रमों में भागीदारी के बावजूद रोजगार के मौके क्यों नहीं बढ़ रहे हैं? क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था समय के साथ कदमताल नहीं कर पा रही है? विडंबना यह भी है कि बढ़ती आबादी के बावजूद सरकारी क्षेत्र की नौकरियां कम हो रही हैं। युवाओं की शिकायत होती है कि सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया में तमाम तरह की विसंगतियां व्याप्त हैं। वे परीक्षा प्रणाली पर भी सवाल उठाते रहे हैं। निस्संदेह, बढ़ती बेरोजगारी हमारे विकास के मापदंडों पर भी सवाल खड़ी करती है। निश्चित रूप से संतुलित आर्थिक विकास की सार्थकता के लिए जरूरी है कि देश में प्रति व्यक्ति आय बढ़े तथा आर्थिक असमानता भी दूर हो। तेज विकास दर के साथ लोगों के जीवन में खुशहाली भी आनी चाहिए। रोजगार के अवसर बढ़ने से ही समाज में खुशहाली आ सकती है। जब देश में रोजगार के मौके बढ़ेंगे तो समाज में वास्तविक समृद्धि आ सकती है। रोजगार के अवसर बढ़ने से उत्पादकता बढ़ेगी और महंगाई पर नियंत्रण पाने में भी मदद मिलेगी। निस्संदेह, बढ़ती क्रय शक्ति भी अर्थव्यवस्था को गति देती है। निर्विवाद रूप से बेरोजगारी कम किए बिना हम देश के सौ साल पूरे होने तक विकसित भारत का लक्ष्य मुश्किल से हासिल कर पाएंगे। हमें एआई व डिजिटल चुनौती के मुकाबले के लिए युवाओं का कौशल विकास तेज करना चाहिए।
बेरोजगारी न केवल आर्थिक विकास को धीमा करती है बल्कि युवाओं में निराशा, डिप्रेशन, और अपराध की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही है। स्किल मिसमैच और बढ़ती जनसंख्या के कारण, शहरी क्षेत्रों में यह संकट अधिक गहरा है। नियमित आय के अभाव में, व्यक्ति बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हो जाता है, जिससे जीवन स्तर में गिरावट आती है। रोजगार न मिलने से युवाओं में निराशा, अवसाद (डिप्रेशन) और आत्मसम्मान में कमी आती है। शिक्षित युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप काम नहीं मिलता, जिससे देश की जनशक्ति बेकार हो जाती है। बेरोजगारी बढ़ने से चोरी, नशाखोरी और अपराध की दर में वृद्धि हो सकती है।
बेहतर अवसरों की तलाश में ग्रामीण युवाओं का शहरों की ओर पलायन और अंततः काम न मिलने पर अव्यवस्था ही तो है। शिक्षा प्रणाली और बाजार की आवश्यकताओं में अंतर (स्किल मिसमैच), रोजगार के अनुपात में जनसंख्या वृद्धि, और सर्विस/उत्पादन क्षेत्र में कम अवसर है। बेरोजगारी का यह दंश राष्ट्र की प्रगति में बाधक है और इसे कम करने के लिए कौशल विकास और रोजगारोन्मुखी शिक्षा की आवश्यकता है। विभिन्न कारणों से, उपलब्ध नौकरियों की संख्या जरूरतमंदों की तुलना में बहुत कम है। इस असंतुलन के कारण जनसंख्या अनौपचारिक या असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुसार, भारत में कुल कार्यबल के 80 प्रतिशत से अधिक लोग अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं, जहाँ संगठित क्षेत्र द्वारा आमतौर पर प्रदान किए जाने वाले लिखित रोजगार अनुबंध, सवेतन अवकाश और अन्य लाभों के बिना काम किया जाता है।
भारत के डिजिटल बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के लिए, सरकार ने ’डिजिटल इंडिया’ अभियान शुरू किया। बेरोजगारी के प्राथमिक कारकों में से एक डिजिटल बुनियादी ढांचा है, क्योंकि यह शिक्षा और कौशल उन्नयन को बढ़ावा देता है। इसका मुख्य उद्देश्य डिजिटल साक्षरता, ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देना और भारत के डिजिटल बुनियादी ढांचे में सुधार करना था। यह अभियान उन विभिन्न कार्यक्रमों का एक प्रमुख सहायक घटक रहा है जो सूचना और ज्ञान के आदान-प्रदान के माध्यम के रूप में प्रौद्योगिकी पर निर्भर हैं। यह विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में हाई-स्पीड इंटरनेट कनेक्टिविटी प्रदान करने की दिशा में इंगित करता है। इसने नागरिकों को प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने और अपने कौशल को उन्नत करने में सक्षम बनाया है। डिजिटल इंडिया की इसी सोच के साथ, ’प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल अक्षरा अभियान शुरू किया गया। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के छह करोड़ नागरिकों को डिजिटल रूप से साक्षर बनाना था। इसका लक्ष्य प्रत्येक परिवार से एक सदस्य को शामिल करके लगभग 40 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों तक पहुंचना है। विभिन्न व्यक्तियों को प्रशिक्षण और व्यावसायिक कार्यक्रमों तक पहुंच प्राप्त हुई है। भारत में बेरोजगारी की चुनौती का सामना करते हुए श्रम बाजार की मांग और आपूर्ति को प्रभावित करने वाले कारकों पर विचार करना आवश्यक है। व्यापक आर्थिक मजबूती और बढ़ते निजी निवेश के साथ-साथ इन कदमों से देश में रोजगार की स्थिति में सुधार होने की उम्मीद है। भारतीय अर्थव्यवस्था की मांगों को पूरा करने और भारत के बढ़ते कार्यबल के लिए रोजगार सुलभ सुनिश्चित करने के लिए निकट भविष्य में सहयोगात्मक प्रयास और अनुकूल रणनीतियां आवश्यक हैं।
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