Uttarakhand Darshan

नीलकंठ महादेव मंदिर: समुद्र मंथन का हलाहल पीने के बाद यहां किया था भगवान शिव ने आराम

देहरादून, गढ़ संवेदना। नीलकंठ महादेव मंदिर वह स्थल है, जहां समुद्र मंथन का हलाहल पीने के बाद शिव वर्षों तक आराम करते रहे। बाद में देवताओं के आग्रह पर वे कैलाश पर्वत पर वापस गए। समुद्र मंथन का गरल पीने के बाद शिव का कंठ नीला हो गया था। कई सालों तक ऋषिकेश की एक चोटी पर आराम करने के ...

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यह  है उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा मंदिर समूह

 देहरादून, गढ़ संवेदना। यह राज्य का सबसे बड़ा मंदिर समूह है। देवदार के वृक्षों के बीच संकरी घाटी में स्थित है। आठवीं से दसवीं शती में निर्मित इन कलात्मक मंदिरों का निर्माण कत्यूरी राजा शालिवाहन देव ने कराया था। यहां जागनाथ, महामृत्युंजय, पंचकेदार, डंडेश्वर, कुबेर, लक्ष्मी पुष्टि देवी के मंदिर प्रमुख हैं। यहां का सबसे प्राचीन मंदिर मृत्युंजय मंदिर व सबसे विशाल ...

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बूढ़ाकेदार: सबसे प्राचीन केदार

बूढ़ाकेदार सबसे प्राचीन केदार है। जब सड़क सुविधा नहीं थी, तब केदारनाथ धाम पहुंचने का यही पैदल मार्ग था और केदारनाथ धाम की यात्रा से पहले बूढ़ा केदार के दर्शन जरूरी थे। बूढ़ा केदार धाम बाल गंगा व धर्म गंगा नदी के मध्य स्थित है। पुराणों में उल्लिखित है कि गोत्र हत्या से मुक्ति पाने के लिए पांडव जब इस ...

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उत्तराखंड का राज्य पुष्प ब्रह्मकमल

 ब्रह्मकमल को अलग-अगल जगहों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे उत्तरखंड में ब्रह्मकमल, हिमाचल में दूधाफूल, कश्मीर में गलगल और उत्तर-पश्चिमी भारत में बरगनडटोगेस नाम से इसे जाना जाता है। ब्रह्मकमल भारत के उत्तराखंड, सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश, कश्मीर में पाया जाता है। भारत के अलावा यह नेपाल, भूटान, म्यांमार, पाकिस्तान में भी पाया जाता है। ब्रह्मकमल का अर्थ है ...

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वीर भड़ माधो सिंह भंडारी की अमर गाथा

  माधो सिंह भंडारी को माधो सिंह मलेथा भी कहा जाता। माधो सिंह का जन्म सन् 1595 के आस-पास उत्तराखंड राज्य के टिहरी जनपद के मलेथा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम सोणबाण कालो भंडारी था। उनकी बुद्धिमता और वीरता से प्रभावित होकर तत्कालीन गढ़वाल नरेश ने सोणबाण कालो भंडारी को एक बड़ी जागीर भेंट की थी। माधो ...

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पैठाणी उत्तराखंड में भारत वर्ष का एकमात्र प्राचीनतम राहू का मंदिर

उत्तराखंड में पैठाणी के मंदिर में सदियों से राहू की पूजा होती आ रही है। पूरे भारत वर्ष में यहां राहू का एकमात्र प्राचीनतम मंदिर स्थापित है। यह मंदिर पूर्वी और पश्चिमी नयार नदियों के संगम पर स्थापित है। कोटद्वार से लगभग 150 किलोमीटर दूर थलीसैण ब्लॉक के पैठाणी गांव में स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि जब ...

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नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर डोडीताल

नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर डोडीताल ट्रैक पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। चारधाम आने वाले यात्री भी डोडीताल के प्राकृतिक सौंदर्य का लुफ्त उठा रहे है। पर्यटकों को यहां सुंदर झील, दुर्लभ प्रजाति की मछलियां और बर्फीले बुग्याल देखने को मिल रहे है। ट्रैकिंग का शौक रखने वालों के लिए डोडीताल किसी जन्नत से कम नहीं है। उत्तरकाशी ...

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आइए जानते हैं गढ़वाल में राजपूत जातियों का इतिहास

देहरादून, (गढ़ संवेदना)। गढ़वाल में जिस प्रकार से ब्राह्मण तीन भाग में विभक्त हैं, क्षत्रिय यहां दो भागों में विभक्त हैं। एक असली क्षत्रिय राजपूत और दूसरे खस राजपूत। राजपूत का अभिप्राय असली क्षत्रिय राजपूत से है। खस राजपूत जाति राजपूत और खसिया जाति के मेल से पैदा हुई है। राजपूत जाति में उनके वंश परंपरा धार्मिक व लौकिक रिवाज ...

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मां भगवती ने इस स्थान पर दैत्यों के संहार के लिए धारण किया था काली का रूप

मां भगवती ने इस स्थान पर दैत्यों के सहांर के लिए काली का रूप धारण किया था । उस समय से इस स्थान पर मां काली के रूप की पूजा की जाती है । कालीमठ मंदिर मां काली को समर्पित है । इसे भारत के प्रमुख सिद्ध शक्ति पीठों में से एक माना जाता है । कहा जाता है कि ...

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यहां गुफा के अंदर बहती है नदी, गुच्चू पानी: रॉबर्स केव की अनसुनी कहानी

देहरादून, गढ़ संवेदना संवाददाता। गुच्चू पानी रॉबर्स केव राजधानी देहरादून से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित है। रॉबर्स केव यानी गुच्चू पानी के नाम से स्थित इस गुफा के बारे में आपने सुना होगा। इसके इतिहास और संस्कृति के बारे में भी बेहद रोचक कहानी है जो कि थोड़ी सी डरावनी भी है। आइए जानते हैं इससे जुड़ी वो कहानी ...

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