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सतोपंथ तालः इस ताल के तीनों कोणों में की थी ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने तपस्या

सतोपंथ तालः उत्तराखंड के चमोली जिले में बदरीनाथ से करीब 21 किमी उत्तर-पश्चिम दुर्गम पहाड़ी में समुद्रतल से लगभग 1334 मीटर ऊंचाई पर स्थित इस ताल/झील के तीन कोण हैं। मान्यता है कि इन तीनों कोणों में ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने तपस्या की थी। पांडव इसके पास स्थित स्वर्गरोहिणी शिखर से स्वर्ग गए थे। इस झील के पास सूर्यकुंड ...

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टिहरी लोकसभा सीटः देहरादून जिले के मतदाता बनेंगे भाग्यविधाता

देहरादून। लोकसभा चुनाव में टिहरी संसदीय सीट की बाजी देहरादून जिले के वोटरों के हाथ में रहेगी। देहरादून के वोटरों का रुझान जिस तरफ होगा, उसका पलड़ा भारी होगा और चुनाव जीतने में आसानी होगी।  टिहरी संसदीय सीट में उत्तरकाशी, टिहरी और देहरादून जिले की 14 विधानसभा क्षेत्र आते हैं। देहरादून जिले के दस विधानसभा क्षेत्रों में सात विधानसभा क्षेत्र ...

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खैट पर्वत पर्यटन व तीर्थाटन की दृष्टि से मनोरम

देहरादून।  टिहरी जिले में स्थित खैट पर्वत पर्यटन व तीर्थाटन की दृष्टि से मनोरम है। खैट पर्वत समुद्रतल से 10 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। खैट पर्वत के चरण स्पर्श करती  भिलंगना नदी का दृश्य देखते ही बनता है। खैट पर्वत वनदेवियों (अप्सराओं) का प्रमुख निवास स्थल है। देवलोक से भू-लोक तक रमण करने वाली ये परियां हिमालय क्षेत्र में वनदेवियों के रूप में ...

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आइए जानते हैं गढ़वाल की ब्राहमण जातियों का इतिहास-कब, कहां से आए और मूलपुरुष

देहरादून,  (गढ़ संवेदना)। गढ़वाल में ब्राह्मण जातियां मूल रूप से तीन हिस्सो में बांटी गई है -1-सरोला, 2-गंगाड़ी  3-नाना । सरोला और गंगाड़ी 8 वीं और 9वीं शताब्दी के दौरान मैदानी भाग से उत्तराखंड आए थे। पंवार शासक के राजपुरोहित के रूप में सरोला आये थे। गढ़वाल में आने के बाद सरोला और गंगाड़ी लोगों ने नाना गोत्र के ब्राह्मणों से शादी की। सरोला ब्राह्मण के ...

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महासू देवता मंदिर: राष्ट्रपति भवन से आती है यहां नमक की भेंट

देहरादून। महासू देवता भगवान शिव के रूप हैं। महासू देवता जौनसार बावर क्षेत्र के ईष्ट देव हैं। यहां हर साल दिल्ली से राष्ट्रपति भवन से नमक की भेंट आती है। महासू देवता मंदिर हनोल में आस्‍था और श्रद्धा का अनूठा संगम देखने को मिलता है। 9वीं शताब्दी में बनाया गया महासू देवता का मंद‌िर काफी प्राचीन है। मिश्रित शैली की स्थापत्य कलामंदिर में ...

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जहां माता अनुसूया ने तप के बल पर त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु व महेश को शिशु रूप में कर दिया था परिवर्तित

 सती अनुसूईया महर्षि अत्री की पत्नी थी। जो अपने पतिव्रता धर्म के कारण सुविख्यात थी। पुराणों में मां अनुसूया को सती शिरोमणि का दर्जा प्राप्त है। अनसूया मंदिर के निकट अनसूया आश्रम में त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु व महेश) ने अनुसूया माता के सतीत्व की परीक्षा ली थी। यहां प्रतिवर्ष दत्तात्रेय जयंती समारोह मनाया जाता है। इस जयंती में पूरे राज्य से हजारों की संख्या में लोग ...

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बूढ़ाकेदार: भगवान शंकर ने बूढ़े ब्राहमण के रुप में दिए थे यहां पांडवों को दर्शन

बूढ़ाकेदार सबसे प्राचीन केदार है। जब सड़क सुविधा नहीं थी, तब केदारनाथ धाम पहुंचने का यही पैदल मार्ग था और केदारनाथ धाम की यात्रा से पहले बूढ़ा केदार के दर्शन जरूरी थे। बूढ़ा केदार धाम बाल गंगा व धर्म गंगा नदी के मध्य स्थित है। पुराणों में उल्लिखित है कि गोत्र हत्या से मुक्ति पाने के लिए पांडव जब इस ...

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हर्षिलः प्रकृति की एक सुंदर उपत्यका

प्रकृति की एक सुंदर उपत्यका हर्षिल। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता है। घाटी के सीने पर भागीरथी का शान्त और अविरल प्रवाह हर किसी को आनन्दित करता है। पूरी घाटी में नदी-नालों और जल प्रपातों की भरमार है। हर कहीं दूधिया जल धाराएं इस घाटी का मौन तोडने में डटी हैं। नदी झरनों के सौंदर्य के साथ-साथ इस ...

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जब राजा भागीरथ तपस्या कर गंगा को पृथ्वी पर लाए थे तो उस समय गंगा की एक धारा यहां सुरकुट पर्वत पर भी गिरी थी

 टिहरी।  सुरकुट पर्वत पर प्रसिद्ध सिद्धपीठ मां सुरकंडा का मंदिर स्थित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहां सती का सिर गिरा था। जब राजा दक्ष ने कनखल में यज्ञ का आयोजन किया तो उसमें भगवान शिव को नहीं बुलाया गया, लेकिन शिव के मना करने पर भी सती यज्ञ में पहुंच गई। वहां दूसरे देवताओं की तरह उसका सम्मान नहीं ...

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नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर डोडीताल

नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर डोडीताल ट्रैक पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। चारधाम आने वाले यात्री भी डोडीताल के प्राकृतिक सौंदर्य का लुफ्त उठा रहे है। पर्यटकों को यहां सुंदर झील, दुर्लभ प्रजाति की मछलियां और बर्फीले बुग्याल देखने को मिल रहे है। ट्रैकिंग का शौक रखने वालों के लिए डोडीताल किसी जन्नत से कम नहीं है। उत्तरकाशी ...

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