सर्वसमावेशी संस्कृति ही है समाधान और सर्वसमावेशी संस्कृति ही है संविधान

ऋषिकेश। एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन ’’सर्व समावेशी संस्कृति कुम्भ’’ में परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज ने सहभाग किया। यह भव्य कार्यक्रम गंगा पाण्डाल, परेड क्षेत्र कुम्भ मेला प्रयागराज में उत्तरप्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज द्वारा आयोजित एवं प्रायोजक उत्तर प्रदेश सरकार, प्रयागराज मेला प्राधिकरण संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार आयोजित किया गया।
 इस सम्मेलन का उद्देश्य है कि जब सम्पूर्ण दुनिया आतंकवाद, भोगवाद, एवं पांथिक असहिष्णुता से ग्रस्त है तब एक बार पुनः सबकी दृष्टि दुनिया की प्राचीनतम संस्कृति भारत के सर्वसमावेशी विचार एवं व्यवहार की तरह आकृष्ट हो रही है। आज इसकी आवश्यकता प्रतीत हो रही है कि भारत के सभी मत, पंथ, सम्प्रदाय एवं आध्यात्मिक विचारधाराओं के धर्माचार्य, एक मंच पर एकत्रित होकर ’एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ एक ही सत्य के अनेक रूपों में वर्णन का पुनः उद्घोष कर न केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व के लिये शान्ति, सद्भाव एवं समृद्धि का उद्घोष किया जा सके।
इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती  महाराज ने कहा कि यह सर्वसामवेशी संस्कृति कुम्भ है। सच माने तो कुम्भ में यह एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन हो रहा है लेकिन हमारे देश की, हमारे राष्ट्र की यही तो पहचान हैय यही तो हमारी संस्कृति है जिसमें सभी का समावेश है। प्रयागराज कुम्भ मेला में आयोजित इस सर्वसमावेशी संस्कृति कुम्भ के लिये स्वामी चिदानंद महाराज ने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री  योगी आदित्यनाथ  की सोच को प्रणाम करते हुये कहा कि मुख्यमंत्री ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जो प्रयाग की माटी से जुड़े है उसे एक नयी दिशा प्रदान की है। यह सरकारी,  सरकार नहीं बल्कि संस्कारी सरकार है ।इस सरकार की सोच है कि ऐसे भारत का निर्माण करना हैं जिसने सभी का समावेश हो, सभी का सतत विकास हो और सुरक्षित विकास हो। दिव्य और भव्य कुम्भ से इस सोच का ही विस्तार हो यही है संगम, यही है अमृत। यह सोच हमें अपने ऋषियों ने दी थी, ऋषियों ने स्वयं पत्ते खा कर हमें जीवन का पता बताया तथा जीवन में अपनी सोच को परिशोधित करने का मौका दिया। उन्होने अपने लिये नहीं बल्कि अपनों के लिये जीने का संदेश दिया और उन अपनों में वसुधैव कुटुम्बकम् की संस्कृति, विश्व एक परिवार की संस्कृति समाहित है इसका सन्देश दिया। भारत एक बाजार नहीं, भारत एक परिवार है।

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