विदेशी धरती पर भी खासे लोकप्रिय हैं जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण

देहरादून। पद्मश्री जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण उत्तराखंड की जागर एवं लोक विरासत को सहेजने में लगे हैं। उत्तराखंड संस्कृति का संरक्षण ही उनके जीवन का मकसद है, ताकि युवा पीढ़ी को इस धरोहर से रू ब रू कराया जा सके। प्रीतम भरतवाण की जागर प्रस्तुति के जादू का ही नतीजा है कि विदेशी धरती पर भी वे खासे लोकप्रिय हैं ।

पद्मश्री लोकगायक प्रीतम भरतवाण का जन्म देहरादून जिले के रायपुर ब्लॉक के सिला गांव में हुआ। बेहद सामान्य परिवार में जन्मे प्रीतम भरतवाण को शुरू से ही लोकसंस्कृति से खास लगाव रहा।  महज छह साल की छोटी उम्र से ही प्रीतम ने लोककला को गले लगा लिया था। बचपन में वह लोकगीत व वाद्ययंत्रों से आकर्षित थे। इसके बाद उन्होंने गढ़वाली गीतमाला के जरिये अपनी आवाज का जादू बिखेरा। इसके बाद उनकी जागर की प्रस्तुति इतनी लोकप्रिय हुई कि उन्हें ‘जागर सम्राट’ कहकर पुकारा जाने लगा। 1988 में भरतवाण ऑल इंडिया रेडियो से जुड़े और कई सालों तक उन्होंने रेडियो पर प्रोग्राम किए। यहां भी उनके गढ़वाली बोल हर किसी को भाते रहे। उन्होंने ढोल सागर में शोध भी किया है और इसके विकास में भी अनेकों कार्य किए। भरतवाण देश ही नहीं, विदेशी धरती पर भी खासे लोकप्रिय हैं। भरतवाण अमेरिका, जापान, सिंगापुर, इंग्लैंड समेत दो दर्जन से ज्यादा देशों में जागर व लोकगीतों की प्रस्तुति दे चुके हैं। समय-समय पर विदेशों में उनके कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं और बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय उन्हें सुनने पहुंचते हैं। पद्मश्री प्रीतम भरतवाण, लोकगायक का कहना है कि ढोल सागर उत्तराखंड की पुरातन लोक कला है। इसका संबंध देवी-देवताओं से है। मैं जागर में अपना जीवन समझता हूं। आधुनिक युग में युवाओं का लोक संस्कृति के प्रति लगाव कम हो रहा है। इसलिए मेरा प्रयास रहता है कि युवाओं को अपनी परंपरा से रूबरू कराऊं और इस विरासत को सहेजने के लिए प्रेरित भी करूं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*