देश की बेहद खूबसूरत भिलंगना घाटी को इंतजार है विकास का

-हेमचन्द्र सकलानी-


देश के दूरदराज क्षेत्रों की अनेक यात्राएं अब तक कर चुका था। कारण यही था कि अपने देश को जानने की ललक मुझ पर हमेशा छायी रहती थी। यद्यपि अब स्वास्थ पहला जैसा नहीं रहा पर जब पर्वतीस लोक समीति के संयोजक भाई सूर्य प्रकाश सेमवाल जी का अनुरोध आया कि एक बार घुत्तू और भिलंगना घाटी तक घूम कर आओ तो अपने को रोक न सका क्योंकि ये स्थान अभी तक मेरे लिए अछूते थे इसलिए स्वास्थ सही न होने के बाद भी रात में ही देहरादून पहुॅंच गया था। दरसल घुमकड़ी का आनन्द यायावर ही जान सकता है। सुबह पाॅंच बजे रमेश सेमवाल जी के साथ हम हरद्वार के लिए निकले और साढ़े छ बजे सूर्य प्रकाश सेमवाल जी और उनके साथ आये उनके मित्र शशी मोहन रंवाल्टा को लेकर आगे चम्बा की ओर निकल पड़े थे। दस बजे के करीब किसी समय की प्रसिद्ध नागरजा की धार जो कोटी कालोनी के पास है ठहरते हैं। यहाॅं अपने बचपन के दिनों में आकर कुछ देर ठहर कर नीचे बसे अपने गाॅंव भगवतपुर को और अपन पुश्तैनी मकान को देखा करता था। तब यहाॅं से नीचे पेड़ों और कंटीली झाड़ियों के मध्य से बहुत संकरी पगडंडी गुजरती थी जिसमें अकसर फंसकर कपड़े फट जाया करते थे। ऊपर से नीचे ढाल इस तरह की थी कि पैर अपने आप दौड़ लगा दिया करते थे। आज नीचे चारों ओर टिहरी झील लहराती नजर आती है। उस छोटे सागर के मध्य नजरों दौड़ाते खोजने लग जाता हूॅं अपने उस पुश्तैनी मकान को जो कहीं गहरे ताल के तल में समा गया था यही सोवते हुए कि शायद वहाॅं पर रहा होगा, नहीं….नहीं, वहाॅं पर रहा होगा। टिहरी बाॅंध परियोजना बहुत आलोचनाओं के घेरे मे रही थी जिस कारण 35 वर्ष का समय लग गया था इसके अस्तित्व में आने में। लेकिन आज इस परियोजना से कितना फायदा हो रहा है इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। आॅंखों में, मन में बेहद उदासी का भाव तैरने लगता है इससे पहले भावुकता हावी हो हम दो चार स्नैप लेकर बाॅंध की जलराशि के साथ साथ कई किलोमीटर चलते हुए गडोलिया पहुॅंचते हैं, फिर भिलंगना नदी के साथ साथ घनसाली की ओर निकल पड़ते हैं जो खंड, पिल्खी, होते हुए जो यहाॅं से चालीस किलोमीटर दूर है। 30 वर्ष पूर्व जब घनसाली आया था तब छोटा सा असुविधाओं से परिपूर्ण गाॅंव भर था मगर आज यह अच्छा खासा कस्बा नजर आता है। नए नए खूबसूरत मकान हैं, बाजार है, स्कूल, हास्पिटल हैं, एक जल विद्युत परियोजना है, जहाॅं कभी कुछ दिखाई नहीं पड़ता था वहाॅं कई मोटर साईकिल, कई कारें खड़ी नजर आती हैं। निःसंदेह बहुत कमियां रहीं हैं पर विकास हुआ है इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। घनसाली से एक मार्ग बूड़ाकेदार के लिए तो दूसरा मार्ग चिरबटिया के लिए निकलता है और सीधे मार्ग से फिर पोखाल, घरगून होकर घुत्तू पहुॅंचते हैं जो टिहरी से लगभग 62 किलोमीटर दूर है। चीड़ के घने जंगलों के साये में आगे बढ़ते हैं। पोखाल के बाद सड़क इतनी खराब थी कि व्यक्त करना मुश्किल हैं। इसी से पता चलता है कि इस सीमान्त क्षेत्र की कितनी अनदेखी स्वतंत्रता के 68 वर्ष बाद भी हुई है। घुत्तू से आगे दस किलोमीटर दूर रिह नामक गाॅंव है और उससे लगभग्र पन्द्रह किलोमीटर आगे प्रसिद्ध स्थान गंगी है, और गंगी से 42 किलोमीटर दूर प्रसिद्ध खतलिंग ग्लेशियर है जो भिलंगना नदी का उदगम स्थल है। घुत्तू तक अभी तक मोटर मार्ग था और इससे आगे पैदल यात्रा करनी होती थी, लेकिन अब धीरे धीरे मोटर मार्गों का निर्माण हो रहा है मगर बहुत धीमी गति से। भिलंगना घाटी का विस्तार देख मन प्रफुलित हो उठा था। प्रकृति ने अपनी सुन्दरता को यहाॅं खुलकर बिखराया है। बरबस सोचने लग जाता हूॅं बरसात में जब सारे पहाड़ हरितिमा से लकदक हो जाते हैं तब इसका रूप कितना संन्दर होता होगा। निःसंदेह उत्तराखंड की बेहद खूबसूरत घाटी किसी को कहा जा सकता है तो वह भिलंगना घाटी हैं। घुत्तू, भिलंगना घाटी मे बसा छोटा सा कस्बा है। नीचे बहुत छोटा सा बाजार है, स्कूल, कालेज, पोस्ट आॅफिस है, छोटा सा च्किित्सालय है, बस कहने भर को कह सकते हैं। इस पहाड़ी से उस पहाड़ी को जोड़ने के लिए छोटा सा पैदल मार्ग वाला पुल है। इस सबको देखने से ही पता चल जाता है, सुविधाओं से महरूम इस क्षेत्र की दयनीय स्थ्तिि का। सामने की ऊॅंची पहाड़ी पर बसा है तल्ला गाॅंव और मल्ला गवाॅंना गाॅंव इस तरफ काफी ऊॅंचाई पर बसा है रिशिधार गाॅंव, जो पंवाली – त्रियुगी नारायणी मार्ग पर घुत्तू से लगभग दो किलो मीटर की खड़ी चढ़ाई पर बसा है। यही गाॅंव है पर्वतीय लोक विकास समीति के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सूर्यप्रकाश सेमवाल जी का। पर्वतीय लोक विकास समीति एक जानी मानी संस्था जो भिलंग घाटी के उत्थान विकास से सम्बधित अनेक सामाजिक, जनजागरण के कार्यों से जुड़ी हुई है। देश की राजधानी में रहते हुए अक्सर सेमवाल जी को इस क्षेत्र के लिए कार्य करने के लिए यहाॅं भाग कर आते हुए देखता रहता हॅंू। कुछ माह पूर्व ही गंगी और खतलिंग ग्लेशियर तक की यात्रा मात्र वहाॅं की समस्याओं से रूबरू होने के लिए उन्होंने की थी। उनकी जैसी अपने क्षेत्र के प्रति लगाव, समर्पण की भावना आज तक मुझे पर्वतीय क्षेत्र के किसी व्यक्ति में नहीं दिखाई पड़ी। यही कारण था स्वास्थ खराब होने के बाद भी उनके विशेष अनुरोध पर मैं आज उनके साथ इस यात्रा पर आया था।
घूत्तू के एक कालेज में प्रतिभावान छात्र – छात्राओं को प्रोत्साहित करने और उन बुजुर्ग लोगों को सम्मानित करने का बीड़ा उठाकर आये थे जिन्होंने भिलंग घाटी के लिए अपने जीवन का बहुमूल्य समय लगाया और पहाड़ों से पलायन की बाड़ में बहने के विपरीत इसी क्षेत्र में डटे रहे। ऐसे अनेक जनजागरण के कार्यो को भिलंग घाटी की जनता शायद ही कभी भुला पायेगी। कालेज के समारोह में छात्र छात्राओं ने खूबसूरत सांस्कृतिक कार्यक्रमों से अपनी लुप्त होती संस्कृति के दर्शन तो कराये ही साथ ही उसके संरक्षण और संवर्धन के संदेश भी दिये। बच्चों के सुंदर साॅंस्कृतिक कार्यक्रमों ने मनमोह लिया था। बच्चों को उनके द्वारा प्रस्तुत सुंदर कार्यक्रमों के बाद उनको पुरस्कृत करने के बाद, कुछ देर भिलंगना के सुंदर प्रवाह को निहारते कब रात हो गयी थी पता ही नहीं चला। रात लगभग सात बजे सेमवाल जी तथा उनके साथियों का मन सेमवाल जी के गाॅंव रिशीधार गाॅंव जाने को हुआ जिसके लिए सभी ने स्वीकृति प्रदान कर दी थी। अपने स्वास्थ की वजह से मैने जाना नहीं चाहा था क्योंकि मेरी दो बाई पास सर्जरी हो चुकी थीं। लेकिन सब के अनुरोध को टाल न सका। बताया मुझे यह गया कि सामने जो पहाड़ी के ऊपर लाईट दिखाई दे रही है उसके पीछे पहाड़ी की दूसरी ओर गाॅंव है। अंधेरा होने के कारण कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था अतः सभी के साथ ऊपर पगडंडी की ओर पाॅंव बड़ा दिये थे। बीस मिनट बाद चढ़ाई चढ़ते हिम्मत जबाब देने लगी थी। अंधेरे में पचास कदम चलता फिर रूकता। कुछ देर रूक रूक कर कदम बड़ाता रहा यह सोचकर कि अब गाॅंव आने वाला है, अब गाॅंव आने वाला है। मोड़ पर मोड़ निकलते चले गये। दर्द तो हाथ, पाॅंव, सिर, सीने में कहीं नहीं था मगर धड़कन का कहीं पता नहीं चल रहा था। रूक रूक कर, धीरे धीरे, थकान से बोझिल दो घंटे बाद लगभग साढे़ नौ बज रहे थे जब दो किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर पहुॅंचे थे हम घुत्तू के ऊपर पहाड़ी पर बसे सेमवाल जी के रिशिधार गाॅंव। बदन का कोई हिस्सा साथ नहीं दे रहा था। बेचैनी बहुत थी, तब एक घंटे तक लोम विलोम किया, किसी तरह अपने को संयत किया। रात में अंधेरे की वजह से न तो उस दुर्गम चढ़ाई का अहसास हुआ, नहीं रूक रूक कर चलते किसी परेशनी का, पर थकान ने चूर चूर जरूर कर दिया था। एक से चार बजे तक किसी तरह नींद आयी, तब जाकर थोड़ा हल्कापन अनुभच हुआ था।
सुबह उठकर घर से बाहर निकल कर आसपास घाटी की खूबसूरती को देखता हॅंू, लेकिन दूर नीचे जैसे ही नजर गई दिल धक करके रह गया था, ऐसा लग रहा था भिलंगना जैसे पाताल में बह रही हो। विश्वास नहीं हो पा रहा था कि जिसकी दो बार बाई पास सर्जरी हुई है वो पैदल खड़ी दुर्गम चढ़ाई चढ़कर यहाॅं तक आ सकता है। घंटे भर तक हतप्रभ होकर अपने को विश्वास दिलाता रहा कि हाॅं मैं रात में इतनी ऊपर चढ़ाई चढ़कर आया था। भिलंगना जैसे पाताल में बहती दिखाई दे रही थी। भिलंगना पर बनी ‘देब्लिंग लघु बाॅंध परियोजना’ दिखाई पड़ती है। निःसंदेह इस परियोजना ने विद्युत के क्षेत्र में इस घाटी को रात में जगमगा कर रख दिया है। पास के मकान से एक बुजुर्ग महिला अपने हाथ में चार मुंगरियाॅं लेकर आती है, और मुझे भेंट करते कहती है ’बेटा और कुछ तो मेरे पास नहीं है बस ये ही तुम्हें भेंट करने के लिये ला सकी।’ जानकर कितनी खुशी हुई थी कि आज भी अपने पहाड़ के कुछ क्षेत्रों में भयंकर अभाव, गरीबी में भी अतिथी सेवा का निर्वहन लोग कर रहे हैं। ऊॅंगली से नीचे घाटी की ओर इशारा करके बताती है कि वहाॅं तक मेरे खेत हैं जमीन है, पर काम करने वाला कोई नहीं है। पूछने पर बताती है कि एक जवान लड़का है वह मेरठ जा कर बस गया है। निःसंदेह पलायन की इस पीड़ा का दर्द उसकी आॅंख से साफ झलक रहा था। इस घाटी में जहाॅं वन्य जीवों की भरमार है। पर्यटन के लिए खतलिंग ग्लेशियर, सहस्रताल जैसे अनेक स्थल हैं जो आर्थिक दृष्टि से मील का पत्थर साबित हो सकते है। भेड़ पालन, फल पटटियाॅं विकसित कर रोजगार के नए साधन विकसित किये जा सकते हैं। चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं से यह क्षेत्र अब भी बहुत पिछड़ा नजर आता है। खेती के लिए यहाॅं की जमीन कितनी उपजाऊ है बताने की आवश्यकता नहीं। जबकि यहाॅं के लोगों के चरित्र, ईमानदारी, सच्चाई, निश्छलता, अतिथी सेवा का जबाब कहीं नजर नहीं आता। आज भी घाटी के लोग अपना जीवन परम्परागत तरीके से जीते हैं और अपनी संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं। यद्यपि से दूरदराज क्षेत्र में आना यहाॅं की यात्रा करना आज भी काफी कष्ट दायक नजर आती है। अगर सरकार ने, नेताओं ने, अधिकारियों ने इन 68 वर्षों में अपने पर्वतीय क्षेत्र की ओर ध्यान दिया होता तो पलायन का अभिशाप इस क्षेत्र को न झेलना पड़ता। स्विटजरलैंड की यात्रा तो सभी करके आ जाते हैं लेकिन वहाॅं की सरकार ने, वहाॅं के लोंगों ने, वहाॅं के अधिकारियों ने पलायन के बजाय अपने पहाड़ी क्षेत्र को स्वर्ग कैसे बनाया इससे कभी कुछ सीख न ले सके। लौटते हुए बुगलीधार की खूबसूरत पहाड़ी पर स्थापित यहाॅं के प्रसिद्ध जगदी मंदिर में थोड़ी देर ठहर कर पूजा करते हैं और फिर लौट पड़ते हैं भिलंग घाटी के अनेक प्रश्नों के साथ कि यहाॅं के लोगों को केवल शिक्षा, चिकित्सा के लिए, रोजगार के लिए क्या क्या सहना पड़ता होगा, सोचकर ही मन सिहर उठता है। निःसंदेह केवल पर्यटन और कृषि की दृष्टि से ही इस क्षेत्र को यदि विकसित किया जाये, आसान आवागमन की सुविधा विकसित की जाये, तो इस क्षेत्र का सूर्योदय हो सकता है। 

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