दलित हैं इस मंदिर के पुजारी

पौड़ी जिले की धूमाकोट तहसील का मुस्याखांद स्थित यह मंदिर  मानवता का संदेश देने के लिए अनूठा मंदिर है। धर्म जाति के बंधनों से ऊपर उठ कर यह मंदिर मानवता की ऐसी मिशाल कायम किए हुए है, जिसकी जितनी भी प्रंशासा की जाए वह कम ही है। धूमाकोट तहसील के मुस्याखांद स्थित यह मंदिर है भगवान ग्वील भैरव का। ग्वील भैरव का यह पवित्र मंदिर मानवता की अनोखी मिशाल कायम किए हुए है। आज भी दलितों और महिलाओं का कई मंदिरों में प्रवेश वर्जित है वहीं, दूसरी ओर इस मंदिर का पुजारी ही उस वर्ग से है, जिसे सदियों से दबाया और कुचला गया है। दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मेहरा गांव के निवासी ही भगवान ग्वील भैरव के इस प्राचीन मंदिर में पुजारी के ओहदे से पूजा-अर्चना कर मंदिर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित करते हैं। देश-प्रदेश में एक ओर जहां आज भी बहुत से मंदिरों और मठों में दलितों और महिलाओं का प्रवेश पूरी तरह से वर्जित है। ऐसे में स्थित भगवान ग्वील भैरव का यह प्राचीन मंदिर एक चिराग की तरह है जो धर्म की दीवारें लांघकर सच्ची मानवता का संदेश दे रहा है।इतना ही नहीं इस मंदिर की एक और मान्यता है कि जिस किसी ने भी दलित समुदाय के मंदिर के पुजारी के हाथों मिले प्रसाद को ठुकराया तो उसका निकट भविष्य में अनिष्ट भी हुआ है।

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