जो धर्म के पक्ष में खड़ा है, उसकी जीत सुनिश्चितः सुभाषा भारती 

देहरादून। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की देहरादून शाखा के साप्ताहिक सत्संग में प्रवचन करते हुए आशुतोष महाराज की शिष्या और देहरादून आश्रम की प्रचारिका साध्वी सुभाषा भारती ने कहा कि महापुरूषों के अनुसार धर्म की शास्त्र-सम्मत परिभाषा यही है कि धर्म जो धारण करने योग्य है। धर्म शब्द संस्कृत की ध्री धातु से उत्पन्न है और इसका सीधा और सटीक सम्बन्ध परमात्मा से मिल जाना, उनका दर्शन कर लेना, उनके अनुसार जीवन को चलाना ही है। धर्म को सीमित दायरों में समेटा ही नहीं जा सकता। मानव मात्र का धर्म मात्र एक ही है।
अपने-अपने मतानुसार धर्म की परिभाषा को रेखांकित नहीं किया जा सकता है। धर्म सम्प्रदायों के संर्कीण दृष्टिकोण से कहीं व्यापक और सार्वभौमिक है। धर्म की परिभाषा को यदि हृदयांगन में जीवंत देखना हो तो ईश्वर की शाश्वत्-सनातन भक्ति को अपनाना होगा। शाश्वत् भक्ति वह कल्पतरू है जिसकी प्राप्ति के उपरान्त मानव मन के समस्त संशय, सभी उलझनें ठीक उसी प्रकार समाप्त होने लगते हैं जिस प्रकार सूर्य की प्रथम किरण का स्पर्श पाते ही घनघोर रात्रि समाप्ति की ओर प्रस्थान करने लगती है। सत्संग विचार भक्ति मार्ग में आगे बढ़ने के लिए बल प्रदान करते हैं। जिस प्रकार एक बीज धरती में बोए जाने के उपरान्त पानी, खाद्य, सूर्य प्रकाश, सुरक्षा मांगता है और तभी वह बीज पौधा, पेड़, फूल और तदुपरान्त फल के रूप में विस्तार पाता है ठीक इसी प्रकार शाश्वत् भक्ति हेतु सत्गुरू द्वारा ‘ब्रह्म्ज्ञान’ का बीजारोपण मनुष्य के हृदयपटल पर जब किया जाता है तब गुरू द्वारा इस बीज को पोषित-पल्लवित करने हेतु सत्संग-विचारों रूपी खाद्य, पानी, वायु और कृपा सूर्य की रौशनी के साथ-साथ अपनी अप्रतिम सुरक्षा के बीच इसे परवान चढ़ाया जाता है। समय पर यह बीज विशाल छायादार-फलदार वृक्ष के रूप में परिवर्तित होकर समस्त मानवता को शीतल छाँव और मधुर फलों से तृप्त किया करता है। यही मानव जीवन का महान फलसफा है जो परमात्मा द्वारा निर्धारित किया गया है। पूर्ण गुरू ही धर्म के वास्तविक अधिष्ठाता हैं जिनके सानिध्य में मानवता धर्म सम्मत आचरण से सदा तिरोहित हुआ करती है।
कार्यक्रम को सुमधुर भजनों की प्रस्तुति देते हुए आरम्भ किया गया। 1. लगन तुमसे लगा बैठे जो होगा देखा जाएगा, तुम्हें अपना बना बैठे जो होगा देखा जाएगा…….. 2. लोग इस जहां के भूल जाएंगे सत्गुरू न हम तुम्हें भुलाएंगे, दुनिया से हम चाहे रूठ जाएंगे सत्गुरू न हम तुम्हें भुलाएंगे……. 3. सत्गुरू मेरे तेरे बिना जीना मेरा, मर जाना ही होगा…….. तथा 4. एै जीव कर करम वो, जो सत्गुरू को भाए………. इत्यदि भजनों में संगत खो सी गई। भजनों की गहन विवेचना करते हुए मंच का संचालन साध्वी विदुषी ममता भारती के द्वारा किया गया। सुश्री भारती ने कहा कि मनुष्य की जैसी दृष्टि हुआ करती है वैसी ही सृष्टि उसे दृष्टिगोचर होने लगती है। मानव मन जन्म-जन्मांतरों के कर्म संस्कारों के बन्धनों में जकड़ा हुआ होता है और उन्हीं के आधीन कर्म करने को विवश होता रहता है। बुरी आदतों और विकारों के परवश हो वह स्वयं को लाचार पाता है। महापुरूष जब-जब इस धरा पर आते हैं तो वे मानव मन की इसी विकट दशा का समुचित हल उसके समक्ष प्रस्तुत करते हैं। महापुरूषों ने सत्संग का प्रावधान इसीलिए किया ताकि इंसान को एक सुन्दर और सही दिशा की ओर उन्मुख किया जा सके। सत्संग में आकर वहां दिए जा रहे सुविचारों के माध्यम से मानव मन को एक उन्नत दिशा की प्राप्ति होती है और इस दिशा की ओर चलते चले जाने पर उसकी दयनीय दशा सुधरने लगती है। सत्संग के सम्बन्ध में बताया गया कि सर्वप्रथम श्रवतव्यो इसके बाद मनतव्यो और तदुपरान्त दृष्टतव्यो। अर्थात पहले सुना जाए तत्पश्चात् मनन किया जाए और फिर पूर्ण गुरू के द्वारा ईश्वर का दर्शन किया जाए।

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