जीव से ब्रह्म् तक की ‘दिव्य यात्रा’ है ‘महाशिवरात्रि’ः जाह्नवी भारती

देहरादून। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के तत्वावधान में आयोजित रविवारीय साप्ताहिक सत्संग में प्रवचन करते हुए आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी जाह्नवी भारती ने कहा कि अध्यात्म भूमि भारतवर्ष पर्व पधान देश इसलिए है क्योंकि यहां मनाए जाने वाले अनेकों पर्वों-त्यौहारों में अध्यात्म की ऊंचाई तक ले जाने वाले संदेश समाहित हुआ करते हैं। पर्व का अध्यात्मिक अर्थ ही है जीव का परमात्मा के साथ शाश्वत् सम्बन्ध। अज्ञानता रूपी कालरात्रि से परे, ज्ञान रूप शिव की प्राप्ति हो जाना ही महाशिवरात्रि के पर्व को सार्थक करता है। भगवान भोलेनाथ का तो सम्पूर्ण स्वरूप ही ज्ञान से ओत-प्रोत है। भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा का पूजन, शिवलिंग का अभिषेक, उनकी प्राप्ति की प्रथम सीढ़ी हैं।
उन्होंने  कहा कि शिव की वास्तविक उपासना मनुष्य के अनर्तजगत में शुरू होकर उनकी प्राप्ति पर सम्पन्न हुआ करती है। जीव का ब्रह्म् की महायात्रा पर 0प्रस्थान है, महाशिवरात्रि का परम उद्देश्य। शिव की प्राप्ति मनुष्य हृदय में घटित एक दिव्य घटना है। ब्रह्म् मिलन की यात्रा मन और बुद्धि से नहीं अपितु श्रद्धा की गहराईयों से ही चलाएमान हो पाती है। शास्त्रों में दुर्लभ मानव तन में स्थित आत्मा को जानना ही जीवन का लक्ष्य कहा गया है। महापुरूषों ने मनुष्य के शरीर को जहां एक ओर सर्वोच्च दर्जा देकर इसका गुणगान किया है, वहीं दूसरी ओर ईश्वर की भक्ति के बिना इस शरीर को जीवित शव के सदृश्य भी कह दिया है- राम भक्ति जाके हृदय नाहिं आनी, जीवित शव समान तेहि प्रानी। देवताओं के लिए दुर्लभ मनुष्य का तन मात्र इसी वजह से अनमोल है क्योंकि इसी में रहकर जीव परमात्मा की भक्ति और उनकी प्राप्ति दोनों कर सकता है। अन्य किसी भी जीव-जन्तु या देवी-देवता को यह उपलब्धि हासिल नहीं है। स्वर्ग में स्थित देवी-देवता अन्य समस्त मामलों में सक्षम हैं, वे इच्छा मात्र से ही समस्त भोग-वैभव तत्काल प्रकट कर सकते हैं। वे मानव तन के लिए इसलिए लालयित रहते हैं ताकि वे भी ईश्वर प्राप्ति कर अपने आवागमन को समाप्त कर सकें, ईश्वरीय धाम की प्राप्ति कर सकें। मनुष्य को ईश्वरीय मिलन की सर्वोच्च उपलब्धि भी एक जगह आकर गौण सिद्ध हो जाती है, यदि मनुष्य के जीवन में कोई पूर्ण सद्गुरू न आ पाए तो। गुरू ही उसकी देह को एक एैसे दिव्य मंदिर के रूप में परिवर्तित करते हैं, जिसके भीतर परमात्मा की प्रतिमा नहीं बल्कि स्वयं परमात्मा विराजमान हैं। शास्त्रों में पूरे गुरू की महिमा गाते हुए इनकी प्राप्ति के लिए सर्वस्व अर्पण कर देने की बात कही गई है क्योंकि पूरे गुरू के बिना मनुष्य जीवन का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो पाता। साध्वी जाह्नवी भारती ने महाशिवरात्रि के अनेक ज्ञानवर्धक पहलुओं को छुआ। सती प्रसंग को विस्तार से रेखांकित करते हुए उन्होंने भगवान भोलेनाथ से सम्बन्धित अनेक शास्त्रोक्त प्रसंगों को उद्धृत करते हुए शिव को परम कल्याणकारी शक्ति बताते हुए उनके वास्तविक अवयक्त आदि नाम की भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि शिव का वास्तविक नाम मनुष्य की हर आती-जाती श्वांसों के भीतर पिरोया हुआ है, यह नाम एक आदि स्पन्दन के रूप में विद्यमान है जिसे बाहरी कानों से नहीं सुना जा सकता है। शास्त्रों में इसी आदि नाम का जगह-जगह उल्लेख किया गया है। कोटि नाम संसार में तांते मुक्ति न होए, आदि नाम जो गुप्त जपै बूझै बिरला कोए। भगवान शिव महादानी हैं, भक्तों को सबकुछ देने वाले हैं, शीघ्र प्रसन्न हो जाने के कारण ही उनका एक नाम आशुतोष भी है। स्वयं शमशान में रहते हुए जीव को उसके अंतिम निवास का और शरीर पर राख मलकर मानव असतित्व को एक मुठ्ठी राख समझने का संदेश देते हैं। गले में सर्पों की माला मानव पर काल का फंदा होने की सूचना है, सर पर चंद्रमा ईश्वर के वास्तविक स्वरूप प्रकाश को प्रतिबिम्बित किया करता है। डमरू ईश्वरीय ब्रह्म्नाद का प्रतीक है। शीश पर विराजमान मां गंगे जीव के भीतर निरंतर बरस रहे अमृत का प्रतिनिधित्व करती हैं। त्रिशूल तीन तापों को हर लेने का धोतक है। विदुषी जी ने बताया कि यह सब चीजेघ्ं एक एैसा गुप्त रहस्य हैं जिन्हें केवल मात्र पूर्ण सद्गुरू ही उद्घाटित किया करते हैं। मनुष्य यदि चाहे कि वह अपने मन व बुद्धि के द्वारा देवाधिदेव भगवान शंकर को समझ लेगा तो एैसा असम्भव है। शिवजी को पूर्ण रूपेण जानने के लिए, उनकी शास्त्र-सम्मत आराधना के लिए, उनकी वास्तविक प्राप्ति के लिए सद्गुरू ही एकमात्र माध्यम हैं जो भोलेनाथ को जीव के हृदयांगन में प्रकट कर देने की अद्वितीय क्षमता रखते हैं।?प्रसाद का वितरण करते हुए साप्ताहिक कार्यक्रम को विराम दिया गया।

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