उत्तराखण्ड के लिए क्या है, इस अंतरिम बजट में ?

देव कृष्ण थपलियाल । 
एक तारीख फरवरी को देश के कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल, जब देश की संसद में अंतरिम बजट भाषण पढ‐ रहे थे, तो पलभर के लिए ऐसा लगा मानों वे बजट भाषण नहीं किसी ’चुनावी घोषणा पत्र’ का वाॅचन कर रहे हों ? बेशक चुनाव सर पर हैं, ऐसे में अंतरिम बजट पर ’चुनावी छाया’ न लगाना, (किसी भी सियासी दल के लिए) असंभव है, हुआ भी ऐसा ही। ’मास्टर स्ट्रोक’ व ’सर्जिकल स्ट्राइक’ की धनी सरकार नें योजनाओं की झडी भी ऐसे लगाई की विपक्षियों की बोलती बंद हो गई ? बजट का इस्तेमाल उस वर्ग को आकर्षित करनें में बखुबी हुआ, जो समाज का बहुसंख्यक मतदाताओं का वर्ग है, उसे राहत और मदद का पिटरा खोलकर सरकार नें मिशन-2019 कीे कामयाब बनानें की दिशा में रास्ता बनानें की कोशिश की ? अब ये वक्त ही बतायेगा की सरकार का ’नुक्सा’ कितना कारगर साबित होता है ?
लगभग सभी वर्गों, क्षेत्रों अथवा समुदाय,व्यवसाय के लोंगों के लिए सरकार के पिटारें में कुछ-न-कुछ था, जिसनें इस अंतिम (अंतरिम) बजट को काफी लजीज बना दिया ? खास बात ये भी है की सरकार का ध्यान वहाॅ भी गया, जहाॅ कभी किसी का ध्यान नहीं गया, अंसगठित क्षेत्र के अलावा ऐसे समुदाय जो घुमन्तु, जीवन यापन करते हैं, उनका कोई निश्चित ठौर-ठिकाना नहीं होता है, यह निर्धन वर्ग जो सदियों से उपेक्षित, तिरस्कृत और अपमानित जीवन यापन करनें को मजबूर है, उनके लिए आज तक कोई सामाजिक सुरक्षा जैसी कोई नीति, अथवा कार्यक्रम का अभाव था, वित्त मंत्री ने उन्हें उभारनें के लिए साॅकेतिक अंाशिक पेंशन ही सही, देंनें की घोषणा की है।
’प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ नाम से बनाई गई योजना के तहत छोटे किसानों को तीन किश्तों में सालाना 6,000 रू0 नगद सहायता राशि देंनें की घोषणा की है जिसे तत्काल (दिसम्बर 2018) से ही अमल में लानें के निर्देश है। इस योजना से सरकारी खजानें पर सालाना 75,000 करोड का अतिरिक्त बोझ पडेगा ? अनुमान है की इस योजना से 12 करोड किसानों को सीधे फायदा होगा ? पशुपालकों व मछुआरों को भी किसान का दर्जा प्रदान किया है, जिससे उन्हें भी किसानों को हासिल होंनें वाली वे सभी सुविधाऐं और ओर प्रोत्साहन का लाभ मिल सके। गाॅव, गरीब और किसान को केद्र में रखते हुए, वित मंत्री नें देशी गायों के संरक्षण के लिए ’कामधेंनू आयोग’ का गठन किया है, यह स्वतंन्त्र निकाय गायों के संरक्षण, संवद्र्वन और गाय के विरूद्व काम करनें वालों पर सख्त कार्यवाही करेगा। व्यावसायिक, सामाजिक और साॅस्कृतिक तौर पर भी इस तरह के आयोग की आवश्यकता भी थी। गिर, ककरेज, आॅनगोल, सहीवाल और राठी समेत भारतीय गायों की आधा दर्जन नस्लें ब्राजील में बहुत अच्छा कर रही है, गिर नस्ल की गाय जो मूल रूप से गुजरात की हैं, 100 लीटर दूध प्रतिदिन तक दे रही हैं की उत्पादकता को बढानें के लिए यह कदम निश्चित रूप से वरदान सिद्व हो सकता है।
असंगठित क्षेत्र के कई ऐसे काम हैं, जिनमें लगे लोगों को, अपनें व्यवसाय में कोई विशेष फायदा भी नहीं होता। ’प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना’ के नाम से शुरू किये गये अभियान से रिक्शा चालकों, रेहडी दूकानदारों,खेत मजदूर, पहाड पर जीप से सवारी ढोंनें वाला चालक,या बस, ट्रक ड्राइवर (जिनका पीएफ नहीं कटता) ब्यूटी पार्लर चलानें वाली महिला, मिस्त्री, मजदूर, नाई, धोबी, घरों में काम करनें वाले झाडू पोछा, करनें वालों ट्यूशन पढानें वालों के लिए 3,000 रूपये सालाना पेंशन योजना शुरू की गई है। 60 साल के बाद मिलनें वाली इस पेंशन राशि के लिए श्रमिक को 100 रूपये मासिक का योगदान करना होगा, जिसमें 100 रूपये सरकार ओंर से दिये जायेंगें। ऐसे मध्यम वर्गीय लोंगों को जिनकी सालाना आय पाॅच लाख रूपये तक है, को आयकर से मुक्त रखा गया है।
बजट में बहुत सी ऐंसी चीजें हैं, जो गाॅव, और गरीब पर केंद्रित हैं, और बिल्कुल नई हैं, यही वह वर्ग है, जिसको सरकारी मदद की सबसे ज्यादा दरकार होती है, अगर ये योजनाऐं धरातल पर उतरती है, तो देश भाजपा मोदी सरकार का बहूत बडा उपकार होगा !
इसी कारण यह उम्मीद जगना स्वाभाविक था, की सीमान्त राज्य उत्तराखण्ड के आम वाशिंदों को ’डबल इंजन’ की इस सरकार में राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थिति के अनुरूप ’कुछ खास’ तवज्जो मिलेगी ? इतनें व्यापक जनाधार ( 70 सीटों वाली विधान सभा में 59 विधायक भाजपा के है।) के बाद भी केन्द्रीय बजट की ये बेरूखी, राज्य के आम जनमानस की नाराजगी स्वाभाविक है ? बकौल पूर्व मुख्य सचिव श्री इंन्दु कुमार पाण्डे केन्द्रीय बजट के निर्माण से पूर्व हर राज्य से उसका ’फीड बैक’ लिया जाता है, इस बजट में राज्य से फीड बैक लिया गया होगा, जिसकी बजट में घोर उपेक्षा झलकती है। मसलन बिसौंणा गाॅव के हरी सिंह बताते हैं, की पिछली बार जब उन्होंनें आलु की फसल तैयार की तो रात-दिन के कठोर परिश्रम के बाद जितना आलू पैदा हो पाया उसका सही मुनाफा तो छोड दीजिए उसका उचित मेहनताना भी उन्हें नसीब नहीं हुआ,या इस बात को यूॅ कहें की पर्वतीय किसानों की उनकी नगदी फसलों का न तो कभी उचित मुल्य मिल नहीं कोई विशेष लाभ ही ? जिस आलु प्रति 12 से 15 रूपयें प्रति किलो उन्होंनें जिसे बेचा था, वही थौडी दूर पर स्थित बाजार में बिचैलिया उसे रू0 25 से रू0 30-35 किलो के हिसाब से बेचता है ? राज्यभर के किसानों की यही समस्या है ? सही रख-रखाव व विपणन की उचित व्यवस्था के अभाव में पहाडी खेती-किसानी दम तोड रही है, लगभग सभी नकदी फसलो की पैदावार ऊॅगलियों में गिननें लायक रह गई हैं, जंगली जानवरों के आतंक और खौफ से अकेले आनें-जानें से घबरानें लगे हैं, खेतों की फसल तो वे उगनें से पहले ही खा जा रहे हैं । नतीजन आज इस पहाडी राज्य की जो पारम्परिक खेती-बाडी भी थी, वे सभी विलुप्त होंनें की कगार पर है,। आज राज्य के किसानों की संख्या का ठीक-ठीक आॅकडे ही उपलब्ध नहीं हैं। कृषि और राजस्व विभाग के आॅकडों के अनुसार राज्य में किसानों की संख्या 8,81,305 हैं, इसमें 1,48,817 छोटे जबकी 6,59,64 लघु सीमान्त किसानों तादात है। लेकिन ध्यान देंनें वाली बात ये होगी की खेती-किसानी इन कठनाईयों के मध्यनजर अधिकाॅश लोग (किसान) पलायन कर चुके हैं, अथवा अपनें व्यवसाय को बदल चुके हैं, ऐसे में केन्द्रीय बजट में घोषित 6,000 रूपये की राशि भी इन लोगों को नहीं मिल पायेगी ?
राज्य में पर्यटन-तीर्थाटन की संम्भावनाओं को लेकर बडी-बडी बातें करनें वाली सरकार नें बजट में एक भी ऐसा प्रावधान तय नहीं किया, जिससे राज्य में पर्यटन व्यवसाय को विकसित किया जा सके, और उससे अधिक से अधिक आर्थिकी और नौजवानों को रोजगार के अवसरों को बढाये जा सकें ? खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उत्तराखण्ड के नैसर्गिक शौंदर्य को लेकर अभिभूत हैं, वे राज्य की हर परिस्थिति से अच्छी तरह से वाकिफ हैं, उनके बारे में कहा जाता की उनके गर्दिश के दिनों सहारा यहीं राज्य बना था। इसी क्षेत्र के केदारनाथ, उनकी शरणास्थली रही इसी कारण उन्हें भगवान केदारनाथ में बडी श्रृद्वा है, वे बतौर प्रधानमंत्री यहाॅ कई बार आ चुके हैं।
राज्य में कई ऐसे धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान, प्रंसग और भौगाोलिक बूनावट के दृश्य हैं, जिनका शौंन्दर्य देखते ही बनता है, किन्तु वहाॅ तक पहुॅचनें के लिए संपर्क मार्गों से लेकर, प्रचार-प्रसार और सुविधाओं के नितांत अभाव नें उन्हें आज भी दुनियाॅ की नजरों से दूर ही रखा है, कई बार बार फिल्म निर्माताओं नें ऐसे दृश्यों की ’लोकेशन’ को लेकर संजीदगी तो दिखाई परन्तु सुविधाओं के अभाव में उन्हें अपनें फैसले बदलनें पडे ? फिल्म, संभवतः पर्यटन विकास के लिए एक बडा माध्यम होती ? केद्रीय बजट में निश्चित रूप से उंत्तराखण्ड की जरूरतों की घोर उपेक्षा हुई है।
सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र जिसके मध्य में उत्तराखण्ड राज्य स्थिति है, प्राकृतिक आपदा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है, वर्ष में कई बार खासकर बरसात के दिनों में प्राकृतिक आपदाओं से हजारो-करोड की जनधन को क्षति पहुॅचती है, जिससे राज्य का विकास बाधित ही नहीं अवरूद्व हो जाता है। सरकारें योजनाऐं तो बना देती हैं, परन्तु इसके लेकिन ’साइड इफैक्ट’ को लेकर उदासीन रहती है, मसलन चार धाम यात्रा के लिए ’आॅल वेदर रोड’ का निर्माण बडी तेजी से किया जा रहा है, परन्तु उससे उत्पन्न होनें वाले खतरों के प्रति कोई भी एतिहात नहीं बरते जा रहे हैं। ऐसे पहाडी क्षेत्रों के लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं किया गया है। अच्छा होता उत्ंतराखण्ड समेत, सभी 11 पर्वतीय राज्यों के लिए बजट में खास प्रावधान तय होता जिसमे उनकी खास भौगोलिक बनावट के मध्यनजर उनकी समस्याओ पर गंभीरता किया जाता ?

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