जहां माता अनुसूया ने तप के बल पर त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु व महेश को शिशु रूप में कर दिया था परिवर्तित

 सती अनुसूईया महर्षि अत्री की पत्नी थी। जो अपने पतिव्रता धर्म के कारण सुविख्यात थी। पुराणों में मां अनुसूया को सती शिरोमणि का दर्जा प्राप्त है। अनसूया मंदिर के निकट अनसूया आश्रम में त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु व महेश) ने अनुसूया माता के सतीत्व की परीक्षा ली थी। यहां प्रतिवर्ष दत्तात्रेय जयंती समारोह मनाया जाता है। इस जयंती में पूरे राज्य से हजारों की संख्या में लोग शामिल होते हैं। इस अवसर पर नौदी मेले का भी आयोजन किया जाता है जिसमें भारी संख्या में लोग अपने-अपने गांवों से देव डोलियों को लेकर पहुंचते हैं। देव डोलियां माता अनसूया और अत्रि मुनि के आश्रम का भ्रमण करती हैं और माता अनसूया के प्राचीन मंदिर में संतान प्राप्ति के लिए एक बड़ा यज्ञ भी कराया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर में जप और यज्ञ करने वालों को संतान की प्राप्ति होती है। मान्यताओं के अनुसार इसी स्थान पर माता अनसूया ने अपने तप के बल पर त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और शंकर) को शिशु रूप में परिवर्तित कर पालने में खेलने पर मजबूर कर दिया था। बाद में काफी तपस्या के बाद त्रिदेवों को पुनरू उनका रूप प्रदान किया और फिर यहीं तीन मुखवाले दत्तात्रेय का जन्म हुआ था। इसी के बाद से यहां संतान की कामना को लेकर लोग आते रहे हैं। यहां दत्तात्रेय मंदिर की स्थापना भी की गई है। प्रसिद्ध माता अनसूया का प्राचीन मंदिर उत्तराखंड में चमोली जिले में स्थित है।   मान्यता के अनुसार एक बार महर्षि नारद ने त्रिदेवियों (सरस्वती, लक्ष्मी व पार्वती) से कहा कि तीनों लोकों में अनसूया से बढ़कर कोई सती नहीं है। नारद मुनि की बात सुनकर त्रिदेवियों ने त्रिदेवों को अनसूया के सतीत्व की परीक्षा लेने के लिए मृत्युलोक भेजा। तीनों देवता अनसूया आश्रम में साधु वेष में आए और मां अनसूया से नग्नावस्था में भोजन करवाने को कहा। साधुओं को बिना भोजन कराये सती मां वापस भी नहीं भेज सकती थी। तब मां अनुसूया ने अपने पति अत्रि ऋषि के कमंडल से तीनों देवों पर जल छिड़ककर उन्हें शिशु रूप में परिवर्तित कर दिया और स्तनपान कराया। कई सौ सालों तक जब तीनों देव अपने स्थानों पर नहीं पहुंचे तो चिंतित होकर तीनों देवियां अनसूया आश्रम पहुंची तथा मां अनुसूया से क्षमा याचना कर तीनों देवों को उनके मूल स्वरूप में प्रकट करवाया। तब से इस स्थान पर सती मां अनसूया को पुत्रदायिनी के रूप में पूजा जाता है। मार्गशीष पूर्णिमा को प्रत्येक वर्ष दत्तात्रेय जयंती पर यहां दो दिन विशाल मेला भी लगता है। रक्षाबंधन को यहां ऋषितर्पणी मेला लगता है। प्राचीन काल में यहां पर देवी अनुसूया का छोटा सा मंदिर था। सत्रहवीं सदी में कत्यूरी राजाओं ने इस स्थान पर अनुसूया देवी के भव्य मंदिर का निर्माण किया था, मगर अठारहवीं सदी में विनाशकारी भूकंप से यह मंदिर ध्वस्त हो गया था। बाद में संत ऐत्वारगिरी महाराज ने निंगोल गधेरे व मैनागाड़ गधेरे के बीच के क्षेत्र के ग्रामीणों की मदद से इस मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर स्थानीय पत्थरों से बनाया गया है। नवरात्र में अनसूया देवी के मंदिर में नौ दिन तक मंडल घाटी के ग्रामीण मां का पूजन करते है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि अन्य मंदिरों की तरह यहां पर बलि प्रथा का प्रावधान नहीं है। यहां श्रद्धालुओं को विशेष प्रसाद दिया जाता है। यह स्थानीय स्तर पर उगाए गए गेहूं के आटे का होता है। ऋषिकेश से चमोली तक 250 किलोमीटर सड़क मार्ग से पहुंच सकते हैं। यहां से दस किलोमीटर गोपेश्वर पहुंचने के बाद 13 किलोमीटर दूर मंडल तक भी वाहन की सुविधा है। मंडल से पांच किलोमीटर पैदल चढ़ाई चढ़कर मां के मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।