अस्पष्ट विजन, भ्रष्ट सिस्टम, और नेतागिरी की देन है ’पलायन’

–देव कृष्ण थपलियाल–

राज्य की मुख्य समस्या ’पलायन’ को लेकर भाजपा नीत् उत्तराखण्ड सरकार नें इस दिशा में अपनी थांेडी जिम्मेदारी और गंभीरता का एहसास करते हुए ’ग्राम्य विकास और पलायन आयोग’ का गठन किया, इसका मुख्यालय बाकायदा पौडी शहर में स्थापित कर सरकार नें स्पष्ट संकेत दिये है, की पहाड की समस्या का हल पहाड के मध्य में रह कर ही किया जा सकता है, किन्तु आयोग के मुखिया के सन्दर्भ में उसकी यह मान्यता बदल गई ? इस कुर्सी पर विराजमान डाॅ0 शरद सिंह नेगी वन सेवा के अधिकारी के रूप में बेहतर सेवक हैं, और एफ0आर0आई0 के निदेशक के रूप में उनकी सेवाओं का लाभ देश और प्रदेश की जनता को मिला है, वे पहाड में कभी नहीं रहे, परन्तु वे पहाड के सरोकारों से भी वाकिफ हों, इसको लेकर आम जनमानस में संदेह है ? ज्यादा अच्छा होता, सरकार इस काम के लिए किसी सम्बद्व व्यक्ति का चयन करती ? जिसनें पहाड की पगडंडिया चढी हों, धार-खालों का पानी पीया हों, पलायन, पहाड और वहाॅ की जमीनी हकीकत जल, जंगल और जमीन के बारे में थोडा ही सही कुछ समझ होती ? लेकिन ये ’राजनीति’ ही है, जो समस्या को लेकर आॅसू तो झट बहा देती है, पर समाधान के नाम पर ’आडम्बर’ से ज्यादा कुछ नहीं करती ? खैर राजनीतिक सत्ता अपनें हिसाब से काम करती है न की जनता के सुझाव पर, परन्तु इस पर चर्चा फिर कभी ! फिलहाल इस ’पहल’ के लिए सरकार को बधाईं।
राज्य के पहाडी इलाकों के दूर-दराज में बसे गाॅवों के लोंगों नें सदियों से उपेक्षित सा जीवन यापन किया, राज्य के अग्रणी कस्बों, नगरों में जो थोडा विकास व आधुनिकता झलक दिखाती है, उसके पीछे चार धामों में बसे देवी-देवताओं की बडी ’कृपा’ है, इस बहानें ही सही, सडक, बीजली और यातायात में थोडा सुधार है, भारत-चीन सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित होंनें के कारण 1962 के बाद तत्कालीन सरकार नें इस क्षेत्र के महत्व को पहचानना शुरू किया ? कुछ सुधार तो हुआ, लेकिन सरकार नें इस क्षेत्र के दूर-दराज इलाकों की अधिसंख्यक जनता की जरूरतों और उनकी समस्याओं पर कभी ध्यान ही नहीं दिया ? नतीजन आम लोंगों के लिए पलायन के मजबूर होंना पडा ?
इसीलिए ’पलायन’ कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं है, जिसका समाधान चुटकीभर में हो जाय ? यह पहाड के लोंगों की बहुत पुरानीं और लाईलाज बीमारी है, राज्य गठन से पूर्व भी यहाॅ के तमाम बुद्विजीवियों, शिक्षाविदों समाजसेवियों और आॅन्दोलनकारियों ने इस समस्या से निजात पानें के लिए समय-समय पर सरकार और नीति-निर्माताओं से एक पृथक और ’सम्यक नीति’ बनानें का अनुरोध किया, तथापि इस क्षेत्र को पृथक राज्य का दर्जा दिये जानें की माॅग के पीछे ही बडी वजह भी ’पलायन’ थी, लेकिन राज्य निर्माण के बाद जहाॅ पलायन को थमना था/कम होंना/बंद होंना था, दुर्भाग्यवश अब वह गुणात्मक रूप से बढा है, इसके लिए करीब दो दशकों तक ’राज’ करनें वाली भाजपा और काॅग्रेस सीधे-सीधे जिम्मेदार है ?
पिछले 17-18 सालों के इतिहास में सरकार पलायन की समस्या को नजदीक से जाननें-समझनें को तैयार हुई ये बडी बात है, इस पर सरकार की प्रशंसा होंनी ही चाहिए, समस्या की गंभीरता को देखते हुए ’ग्राम्य विकास और पलायन आयोग’’ के सालभर के कार्यकाल में राज्य के पलायन की जो तस्वीर पेश की है, वह आॅखें खोल देंनें वाली है, इससे निश्चित रूप से उन लोगों मदद मिलेगी जो इस समस्या को नजदीक से जानना समझना चाहते हैं। पिछले 5 मई (शनिवार) की सांय को राज्य के मुखिया के साथ आयोग उपाध्यक्ष डाॅ0 एस0एस0 नेगी के साथ एक साल के ’अथक परिश्रम’ से प्राप्त सूचनाओं को राज्य की जनता के मध्य साझा किये, वे उत्तराखण्ड की भयावह तस्वीर पेश करते हंै।
आयोग नें जनवरी से फरवरी के बीच 7,950 गाॅवों में घर-घर जाकर जो कुछ निकाला वो बहुत बडी उपलब्धि है। अपनीं पहली अंतरिम रिर्पोट में आयोग नें जो-जो खुलासे किये हैं, समय रहते उन पर विचार नहीं किया गया तो स्थिति और भी बदत्तर हो सकती हैं ? पिछले 10 सालों में 6,338 ग्राम पंचायतों से तीन लाख 83 हजार 726 लोंगों नें अस्थाई रूप से पलायन किया, जबकी इसी अवधि में एक लाख 18 हजार 981 लोग स्थायी रूप रूप से पहाड को सदा केे लिए बाॅय-बाॅय कह दिया। पलायन कर गये, 565 ऐसे गाॅव व तोंको को चिन्हित किया गया जिनकी आबादी (2011 की जनगणना) आधी (50 प्रतिशत से भी कम) हो गई, जबकी 734 गाॅवों बिल्कुल गैर आबाद यानी भुताहा हो गये हैे ? गौर करनें वाली बात ये भी है की सीमान्त क्षेत्र जो जो अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से करीब 5 किमी के दायरे के भीतर हैं, ऐसे 14 गाॅव भी खाली हो गये, जो सुरक्षा के लिहाज से भी बेहद संवेदनशील है, जिनका आबादी रहित होंना उत्तराखण्ड के लिए ही नहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती है ? अपनी माटी को छोड आये 70 फीसदी लोंग राज्य के नगर-कस्बों में बसे, 29 फीसदी लोग अपनी मातृभूमि को छोड वे देश के विभिन्न शहरों/नगरो/कस्बों चले गये, जबकि 1 प्रतिशत पहाडी लोग ऐसे भी निकले जिन्होंनें अपना राज्य ही नहीं बल्कि देश भी त्याग दिया।
ऐसे लोंगों से ये अपेक्षा करना थोडा कठिन है की वे अपनें गाॅवों, कस्बों की ओंर पुनः रूख करेंगें, लेकिन आयोग और सरकार ये प्रयास जरूर कर सकती है की नये राज्य के निर्माण बाद पलायन को रोका जा सके ? आयोग नें उन कारणों की पडताल भी की है, जिन कारणों से लोंगों को अपनीं मातृभुमि को छोडनें को विविश होंना पडा। उनमें सबसे बडी वजह ’रोजी-रोटी’ का है जिसके कारण 50 फीसदी लोगों को घर छोडना पडा, 15 फीसदी लोंगों नें शिक्षा को लेकर है, और 8 फीसदी लोगो नें स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में पलायन किया। पलायन करनें वालों में अधिकतर नौंजवान बेरांेजगार युवाओं का है, आयोग की रिर्पोट कहती है की, 26 से 35 आयु वर्ग के 42 फीसदी, 35 से अधिक आयु सीमा के 29 फीसदी लो और 25 वर्ष से कम के 28 फीसदी नौजवानों नें नौकरी के लिए पहाड को छोडा।
विरान होते पहाडी इलाके और अपनें गाॅवांे की दूर्दशा से भली-भाॅति परिचित, राज्य का जनमानस भले ’ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग’ की इस अंतरिम रिर्पोट से विचलित न हो, परन्तु ये तस्वीर किसी भी राज्य के वाशिंदों के भविष्य के लिए कतई शुभ नहीं हैं ? कहा तो ये भी जा रहा है की पलायन के मामले में अपना राज्य ही नहीं, देश के हर पहाडी राज्य की अमूमन यही स्थिति है, जम्मू-कश्मीर को छोड हिमाचल में पलायन की दर 36.01 फीसदी, सिक्किम में 34.02 फीसदी और इसी तरह उत्तराखण्ड में पलायन दर 36.02 प्रतिशत है, जम्मू कश्मीर में (17.8 फीसदी) इसलिए कम है, की वहाॅ का कठोर कानून इसकी इजाजत नहीं देता इसका उल्लंघन करनें वालों को वहाॅ की सदस्यता से भी हाथ धोना पडता है, (काश ! उत्तराखण्ड में भी ऐसा ही कुछ कानून होता ?) लेकिन सार्वभौमिक सत्य मानते हुए सीधे-सीधे स्वीकार कर लेना की पहाडी राज्यों की यही नियति है, तो फिर हम बहूत बडी गलती कर रहे हैं ? आज के युग में जहाॅ वैज्ञानिक चाॅद पर बसावट के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं, तो फिर इसी आई0टी0 संसार हम पहाड में तमाम संभावनाओं को नजरअंदाज करते हुए उनका विकास क्यों नहीं कर पा रहे हैं, ? भले यह नेताओं की नेतागीरी के लिए अच्छा बहाना होगा ? पर सच्चाई ये है, की उत्तराखण्ड भी जम्मू कश्मीर राज्य से आगे निकल सकता है, बशर्ते सरकार और जनप्रतिनिधियों का ’विजन’ साफ हो।
देश के अन्य पहाडी राज्यों की तुलना में इस राज्य के पास अतुलनीय प्राकृतिक संपदा, पर्यटन, तीर्थाटन, व दूर्लभ जडी-बूटियों का यहाॅ आकूत भंडार है, प्रकृति प्रदत्त नयनाभिराम दृश्य, अथाह जल राशि, विश्व प्रसिद्व गंगा-यमुना का उदगम स्थल, चार धाम बद्रीनाथ, केदारनाथ गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे पवित्र देव स्थान जहाॅ प्रतिवर्ष देश-विदेश से हजारों-लाखों लोग तीर्थाटन के लिए इस राज्य में आते हैं। तथापि धार्मिक-पौराणिक प्रसंगों से कई ऐसे स्थान हैं/चिन्हित किये जा सकनें की संभावनाओं लिए हैं, जिनके उचित प्रबंधन/नियोजन से आर्थिक समृद्वि के साथ-साथ राज्य को विकसित करनें में मदद मिलेगी, 78.80 फीसदी शिक्षित/साक्षर मानव संपदा का उपयोग राज्य के विकास में किया जा सकता है, ये राज्य की बहुत बडी ताकत सिद्व हो सकती है, 53,483 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले राज्य का 38,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला वन क्षेत्र है, यानी 67 प्रतिशत भूभाग पर अनेक किस्म के वनो की प्रजातिया विद्यमान है, जो न केवल अच्छी साॅसों की गारांटी है, तथा जिनसे अनेक प्रकार की वनोषधियाॅ जिनके सुघनें, लेप लगानें, स्पर्श करनें अथवा उनसे किसी भी प्रकार के उपयोग मात्र से तमाम तरह असाध्य से असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं, बल्कि प्राकृतिक वन सम्पदा खेती-किसानी से लेकर पर्यटन व तमाम तरह से रोजगार के अवसरों को आसानी से उपलब्ध करानें में भी सक्षम है, जिनका सही तरीके से रखरखाव हो तो वे इस राज्य की आर्थिकी में गुणात्मकवृद्वि साथ लाखों जवानों-नौजवानों को रोजगार, और विकास के अनेक नीत नये सोपानों का निर्माण भी कर सकते हैं।
राज्य का प्रमुख व्यवसाय आज भी कृषि है, 44 फीसदी लोग आज भी कृषि व्यवसाय से जुडे हैं, राज्य की कुल जीडीपी में इसकी 16 फीसदी की भागीदारी है। घेस (चमोली) का मटर माॅडल, बागेश्वर का बिस्किट मॅडूवा, बद्रीनाथ धाम का जैविक प्रसाद, (जिससे महिलाओं नें दो महिनें में प्रसाद से नौं लाख रूपये अर्जित किए) जैसे उदाहरणों से पुख्ता होता है, की तमाम प्रतिकुलताओं के बावजूद मेहनत करनें वाले किसानों के द्वार बंद नहीं हुए हैं, सरकार अच्छी तरह जानती है, की राज्य के पहाडी इलाकों में जंगली जानवरों का आंतक है, जिससे खेती-किसानी की बात छोड दीजिए घर अंदर रख सामान भी बंदर सुअर, भालु खासकर बंदर चट कर जाते हैं, बच्चों महिलाओं और बुजूर्गों को वे अपना निशाना बना रहे हैं बावजूद कुछ उद्यमी और उत्साही लोंगों नें श्रम किया और सोना उगाया, हालाॅकि नीति-नियंताओं की ढुलमुल नीति के कारण आज भी राज्य का बहूसंख्यक किसान, उद्यमी निराश है ? इसके लिए अगर उपर्युक्त माहोल की जरूरत है, राज्य की अभी तक कोई निश्चित कृषि नीति नहीं है, अगर है भी तो वह उत्तर प्रदेश सरकार अथवा अन्य सरकारों की कार्बन काफी मात्र है, जबकी राज्य की भौगोलिकता, उपजाऊ क्षमता, फसलों की उत्पादकता हर स्थान पर अलग-अलग है। फसलों, फल-फूलों, सब्जियों और पैदावर के लिए पृथक-पृथक स्थान हैं, जिन्हें ’पहचान’ कर उन्हीं किस्म के पैदावारों को वहाॅ महत्व मिले, मसलन अदरख के लिए, टिहरी का नरेंद्र नगर आलू की पैदावार के लिए चमोली का जोशीमठ, सब्जियों की खास किस्म की उपज के लिए नैंनीताल जिले भवाली, रामनगर से जुडे गाॅवों और कस्बों की जमीन काफी उपयुक्त है। जंगली जानवर का उन्मुलन, विपणन और कोल्ड स्टोरेज (रख-रखाव) की व्यवस्था जब तक पुख्ता नहीं होगी, किसान और जमीन दोंनों ही दम तोडते नजर आयेंगें ?
शुक्र है, सरकार तेरह डेस्टीनेशन की बात कर रही है, टिहरी महोत्सव को भव्य आकार देकर सरकार पर्यटन के क्षेत्र में दो कदम आगे बढी है, राज्य के भूभाग में कदम-कदम पर अनेक पौराणिक, एैतिहासिक मंदिर, स्मारक, प्रतीक चिन्ह, विशिष्ट भौगोलिक स्वरूप, ताल, चाल, गुफाऐ, प्रकृति की आकर्षक बनावटें जिनका सबंध धार्मिक रूप सें जितना गहरा और महत्वपूर्ण है, वहीं उसका आकर्षण और लौकिक अनुभव है, इन जगहों की शानदार अनुभूतियाॅ किसी भी पर्यटक को बार-बार आनें को प्रेरित करेगी। राज्य में अनेक साॅस्कृतिक, सामाजिक धार्मिक परम्पराऐं, रीति-रिवाज हैं, गढवाल, कुमायूॅ मंडल में आयोजित होंनें वाले कई तीज-त्योहारों की अपनी खास रोचकता हैं। जिनका ठीक ढंग से आधुनिकीकरण, और व्यवस्थित रूप देकर कर उसकों संवारा-सजाया जा सकता है। जिन्हें आज की ना समझ पीढी नें आधुनिक दिखनें के चक्कर उन्हें पिछडा, दकियानूसी, काल्पनिक रसहीन बताकर उनसें पिंड छुडानें कोशिश कर रहीे हैं, जबकी हिमालयी क्षेत्रों में होनें वाले कई कौथिग-थौल, खेल-तमासे सामाजिक समरसता, प्राकृति, पर्यावरण और जीव-जन्तु, मनुष्य के प्रति दया प्रेम ओर सहिष्णुता को प्रदर्शित करनें की जीवन्त विधाऐं हैं, उनका विस्तार जहाॅ इन मानवीय गुणों को विकसित करनें में सहयोगी होगा वहीं राज्य के नौजवानों को रोजगार, आजीविका का साधन भी बनेगा। जरूरत है, इनके पहचान की और उन्हें विकसित करनें की।
पलायन बेशक एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसे किसी भी कीमत पर रोका नहीं जा सकता, परन्तु उत्तराखण्ड में जब यही पलायन जब नासूर बन जाय तो, यह खतरनाक प्रवृत्ति है, इसको रोकनें के लिए निश्चित रूप से ठोस पहल होंनी चाहिए, और हमारी नीति-नियंता जन-प्रतिनिनिधिगणों की इस समस्या के प्रति उदासीनता राज्य के हित के लिए शुभ संकेत नहीं है।

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